पत्नी को बेवकूफ और निकम्मा कहना क्रूरता नहीं, सुप्रीम कोर्ट में पति के खिलाफ केस रद्द

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि पत्नी को ‘बेवकूफ’ (Stupid) और ‘निकम्मा’ (Useless) कहना अपने आप में भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के तहत क्रूरता का अपराध नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कनाडा में पत्नी की आत्महत्या के बाद पति के खिलाफ दर्ज दहेज हत्या, प्रताड़ना और अन्य आरोपों से जुड़ी एफआईआर रद्द कर दी।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने कहा कि किसी पति का गुस्सैल या खराब स्वभाव होना अपने आप में आपराधिक धमकी या गंभीर चोट पहुंचाने के अपराध के बराबर नहीं माना जा सकता। खासकर तब, जब इन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सामग्री मौजूद न हो।

कोर्ट ने कहा कि केवल सामान्य आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को पत्नी की आत्महत्या के लिए आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। ऐसा करना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, पति और महिला की शादी 2021 में हुई थी। इसके अगले साल यानी 2022 में दोनों कनाडा के टोरंटो चले गए थे। साल 2023 में महिला ने अपने अपार्टमेंट की 22वीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली थी।

महिला की मौत के बाद अपार्टमेंट से एक हाथ से लिखा नोट मिला था। इसमें उसने अपनी जिंदगी में असफल रहने और एक साल से अधिक समय तक नौकरी नहीं मिल पाने की बात लिखी थी। नोट में उसने कहा था कि वह अब जीना नहीं चाहती और इसलिए अपनी जिंदगी खत्म कर रही है।

महिला के पिता ने इसके बाद पति और उसके परिवार के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि शादी से पहले 15 तोला सोना, शादी के बाद पहली दिवाली पर सोने की अंगूठी और कंगन तथा 2022 में तीन तोला सोने की मांग की गई थी। पिता ने यह भी आरोप लगाया था कि पति उनकी बेटी को प्रताड़ित करता था और उसे ‘बेवकूफ’ व ‘निकम्मा’ कहता था।

मामले की जांच करने वाले कनाडा के कोरोनर और टोरंटो पुलिस की 2024 की क्लोजर रिपोर्ट में संघर्ष या किसी तरह की साजिश के संकेत नहीं मिले थे। जांच में सुसाइड नोट की लिखावट भी महिला की ही पाई गई थी। सीसीटीवी फुटेज से यह भी सामने आया था कि कथित घटना के समय पति घर पर मौजूद नहीं था।

हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने पति के माता-पिता और बहन के खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी थी, लेकिन पति के खिलाफ एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया था। इसके बाद पति ने 2025 में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में नोटिस जारी करते हुए उसके खिलाफ किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का निर्देश दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शादी के समय से लेकर 11 जून 2023 को महिला की मौत तक पति या उसके परिवार की ओर से दहेज की किसी मांग का कोई आरोप सामने नहीं आया था। दहेज मांगने के आरोप 2021 और 2022 से जुड़े थे, जबकि एफआईआर महिला की मौत के बाद दर्ज कराई गई थी। इससे आरोपों पर संदेह पैदा होता है।

कोर्ट ने सुसाइड नोट का भी जिक्र किया। पीठ ने कहा कि नोट में पति या उसके परिवार का कोई उल्लेख नहीं है। अगर दहेज की गैरकानूनी मांगों के कारण महिला को मानसिक या शारीरिक पीड़ा हुई होती तो इसका जिक्र नोट में मिलने की उम्मीद थी।

15 तोला सोने के आरोप पर कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता ने अपने बयान में बताया था कि यह सोना केवल पति को नहीं, बल्कि उनकी बेटी को भी दिया गया था। ऐसे में इसे दहेज की मांग नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह शादी के मौके पर दिया गया उपहार था।

पहली दिवाली पर दिए गए सोने की अंगूठी और कंगन को लेकर भी कोर्ट ने कहा कि भारतीय परिवारों में त्योहारों पर कपड़े, गहने और मिठाइयों का आदान-प्रदान एक सामान्य परंपरा है। ऐसे उपहारों को बिना किसी ठोस आधार के आपराधिक रंग देना उचित नहीं है।

कोर्ट ने महिला के भाई की ओर से ट्रांसफर किए गए एक लाख रुपये का भी उल्लेख किया। पीठ के मुताबिक, यह रकम उस समय ट्रांसफर की गई थी, जब पति ने महिला के भारत आने के लिए फ्लाइट टिकट बुक कराई थी। पति के बैंक खाते में कई लेनदेन थे। ऐसे में किसी एक लेनदेन को अलग करके उसे अपराध का सबूत नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष ऐसा कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाया, जिससे यह साबित हो सके कि पति ने दहेज की गैरकानूनी मांग की थी और उसका महिला की आत्महत्या से कोई उचित संबंध था।

पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल सामान्य तौर पर प्रताड़ना का आरोप लगा देना पर्याप्त नहीं है। क्रूरता साबित करने के लिए यह बताना जरूरी है कि वास्तव में कौन-सी घटना हुई, किस तरह का उत्पीड़न किया गया और आरोपी की क्या भूमिका थी।

कोर्ट ने कहा कि पत्नी को ‘बेवकूफ’ और ‘निकम्मा’ कहने का आरोप, अगर पहली नजर में सही भी मान लिया जाए, तो भी इसे अपने आप में क्रूरता या आपराधिक धमकी का अपराध नहीं माना जा सकता। यह अधिक से अधिक पति के स्वभाव को दर्शाता है, लेकिन इसे पत्नी की आत्महत्या की वजह बताने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

पीठ ने यह भी कहा कि वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में अदालतों को बेहद सावधानी बरतनी चाहिए। आरोपों की गहराई से जांच जरूरी है, ताकि किसी के साथ अन्याय न हो और कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग रोका जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में महिला के परिवार के प्रति संवेदना भी जताई। पीठ ने कहा कि वह उस दर्द को समझती है, जिससे बेटी को खो