कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर में गणधर मुनि विवर्धन सागर महाराज ने मंगलवार को अपने प्रवचन में तप की महत्ता बताते हुए कहा कि तप दो प्रकार का होता है, बाह्य तप और आंतरिक तप। तप के माध्यम से व्यक्ति शरीर के प्रति ममत्व का त्याग कर आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ता है।
मुनि श्री ने बाह्य तप के छह अंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि अनशन, उनोदरी, वृत्ति-परिसंख्यान, विविक्त शय्यासन, रस-परित्याग और कायक्लेश बाह्य तप के प्रमुख स्वरूप हैं। वहीं प्रायश्चित, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान आंतरिक तप के अंग हैं।
उन्होंने कहा कि शरीर के प्रति ममत्व छोड़ना अत्यंत आवश्यक है। जब तक व्यक्ति शरीर और सांसारिक विषयों के प्रति आसक्ति से ऊपर नहीं उठता, तब तक संयमपूर्वक तप की साधना करना कठिन है।
उन्होंने कहा कि तप केवल शारीरिक कष्ट सहने का नाम नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और आंतरिक परिवर्तन की साधना है। सच्ची श्रद्धा और सम्यक भाव के बिना किया गया तप अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकता। तप में बाहरी अनुशासन के साथ मन की निर्मलता और आत्मचिंतन भी आवश्यक है।

