नई दिल्ली। Gold Price Today: MCX पर मंगलवार, 30 जून को सुबह के कारोबार में सोने और चांदी के दाम जोरदार गिरावट के साथ खुले। डॉलर में मजबूती और कमजोर वैश्विक संकेतों की वजह से ऐसा हुआ। ऊपर से अटकलें ये हैं कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व इस साल ब्याज दरें बढ़ा सकता है।
इस महीने सोने की कीमत में करीब 12 फीसदी गिरावट आई है और अक्टूबर 2008 के बाद सबसे बड़ी मासिक गिरावट की तरफ बढ़ रहा है। करीब सुबह 9:10 बजे, MCX पर गोल्ड का रेट 1.28% गिरकर ₹1,40,574 प्रति 10 ग्राम पर आ गया, जबकि सिल्वर फ्यूचर 1.04% टूटकर ₹2,20,322 प्रति किलो पर आ गया।
सोने-चांदी में ये तेज गिरावट डॉलर के मजबूत होने की वजह से आई है। कयास लगाए जा रहे हैं कि लगातार महंगाई के चलते अमेरिकी फेडरल रिजर्व इस साल तीन बार ब्याज दरें बढ़ा सकता है।
डॉलर इंडेक्स 101 के ऊपर पहुंच गया है और लगातार दूसरे महीने बढ़त की तरफ है। इससे विदेशी मुद्राओं वाले खरीदारों के लिए सोना और भी महंगा हो जाता है।
ब्याज दरों के संकेत और आने वाले आंकड़े
वैसे तो सोना महंगाई के खिलाफ एक सुरक्षा कवच माना जाता है, लेकिन जब ब्याज दरें ऊंची होती हैं तो इस पर दबाव बनता है, क्योंकि इस पर कोई ब्याज या रिटर्न नहीं मिलता। CME फेडवॉच टूल के मुताबिक, कारोबारी इस साल अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा तीन बार दरें बढ़ाए जाने की संभावना जता रहे हैं। इसी हफ्ते आने वाले जून के ADP एम्प्लॉयमेंट और नॉनफार्म पेरोल के आंकड़े, फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों की दिशा को लेकर और संकेत देंगे।
सोना गिरकर बड़े रिकॉर्ड बनाने की ओर
रॉयटर्स की खबर के मुताबिक, सोने की कीमतें अक्टूबर 2008 के बाद से अपनी सबसे बड़ी मासिक गिरावट की तरफ बढ़ रही हैं। हाजिर सोने का भाव फिलहाल $3,956.92 प्रति औंस चल रहा है और जून में अब तक करीब 13% टूट चुका है। लगातार चौथे महीने गिरने की राह पर है। इतना ही नहीं, ये 2024 के बाद से पहली तिमाही गिरावट और जून 2013 की तिमाही के बाद की सबसे बड़ी गिरावट साबित हो सकती है।
विशेषज्ञों की राय
मास्टर कैपिटल सर्विसेज के चीफ रिसर्च ऑफिसर रवि सिंह ने कहा, “अंतरराष्ट्रीय सोने की कीमतें लगातार चौथे महीने गिर रही हैं क्योंकि लगातार महंगाई की चिंता और अमेरिकी ब्याज दरें बढ़ने की उम्मीद ने बाजार की धारणा को कमजोर बनाए रखा है।”
उन्होंने ये भी कहा कि बाजारों को इस बात की भी चिंता है कि ऊंची ऊर्जा लागत और AI की वजह से सेमीकंडक्टर चिप्स की बढ़ती मांग, महंगाई को लंबे समय तक ऊंचा रख सकती है, जिससे निकट भविष्य में दरों में कटौती की संभावना कम हो जाती है।

