व्यवहारिक ज्ञान के बिना मानव जीवन का संचालन कठिन है: मुनि विवर्धनसागर

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कोटा। अतिशयकारी चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर में विराग वर्धन वर्षायोग-2026 के अंतर्गत गणधर मुनि विवर्धनसागर महाराज ने गुरुवार को धर्मसभा में कहा कि जैन धर्म में प्रत्येक कथन नय-विवक्षा के आधार पर किया जाता है। लोक व्यवहार भी नय-विवक्षा के बिना सुचारु रूप से नहीं चल सकता।

प्रत्येक व्यक्ति आत्मा से समान है, लेकिन व्यवहार में सभी का अलग-अलग नाम होता है और उसी नाम से एक-दूसरे को पुकारा जाता है। उन्होंने कहा कि व्यवहारिक ज्ञान के बिना जीवन का संचालन कठिन है, लेकिन केवल व्यवहार ज्ञान से आत्मकल्याण संभव नहीं। इसके लिए व्यवहार के साथ निश्चयनय अर्थात अपनी आत्मा के स्वरूप और उसके कल्याण का ज्ञान भी आवश्यक है।

मुनिश्री ने निश्चय और व्यवहार नय की महत्ता समझाते हुए कहा कि दोनों जीवन के लिए साइकिल के दो पहियों के समान हैं। जिस प्रकार एक पहिया निकल जाने पर साइकिल आगे नहीं बढ़ सकती, उसी प्रकार निश्चय और व्यवहार दोनों के समन्वय से ही जीवन सही दिशा में आगे बढ़ता है। व्यवहार नय के अभाव में धर्मतीर्थ और लोक व्यवहार प्रभावित होता है, जबकि निश्चयनय के बिना परमार्थ और आत्मकल्याण का मार्ग अधूरा रह जाता है।

मंदिर समिति के अध्यक्ष राजेंद्र गोधा एवं सचिव पंकज खटोड़ ने बताया कि धर्मसभा में सकल दिगम्बर जैन समाज के अध्यक्ष प्रकाश बज, महामंत्री पदम बड़ला, राजमल पटौदी, मनोज जैसवाल सहित गुरु सेवा संघ परिवार के सदस्य एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।