कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में बुधवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए गणधर मुनि विवर्धनसागर महाराज ने द्रव्यसंग्रह की गाथा संख्या 14 की व्याख्या करते हुए सिद्ध भगवान के आठ गुणों का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि संसार के बंधनों से मुक्ति पाने के लिए व्यक्ति को सबसे पहले अपने भीतर के मोह और आसक्ति का त्याग करना होगा।
मुनिश्री ने कहा कि अक्सर व्यक्ति यह मानता है कि परिवार और संसार उसे बांधे हुए हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि व्यक्ति स्वयं अपने मोह-ममता के कारण इन बंधनों को पकड़े रहता है। यदि व्यक्ति दृढ़ संकल्प कर ले तो वह इन आसक्तियों से मुक्त होकर आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।
उन्होंने कहा कि दर्शनावरणीय कर्म के नष्ट होने से जीव की दर्शन शक्ति पूर्ण रूप से विकसित होती है। इसी प्रकार ज्ञानावरणीय कर्म के नष्ट होने पर अनंत ज्ञान की प्राप्ति होती है। कर्मों के क्षय से आत्मा के स्वाभाविक अनंत गुण प्रकट होते हैं।
मुनिश्री ने मिथ्यात्व का त्याग करने पर जोर देते हुए कहा कि व्यक्ति को सम्यक् दृष्टि अपनानी चाहिए। सही श्रद्धा और सही दृष्टिकोण के बिना आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि हमें छोटी-छोटी बातों पर अपना ध्यान केंद्रित करने के बजाय जीवन के बड़े उद्देश्यों पर विचार करना चाहिए, क्योंकि मनुष्य के विचार ही उसके व्यक्तित्व और जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं।

