वाशिंगटन। US- Iran war: अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ईरान की तरफ से रखे गए सात दिन के सीजफायर प्रस्ताव को मानने से इनकार कर दिया है। अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने इसको लेकर एक रिपोर्ट छापी है, जिसने पश्चिम एशिया में हलचल मचा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि ट्रंप ने अपने करीबी सहयोगियों से कहा है कि नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनाव खत्म होते ही वे ईरान पर दोबारा बमबारी शुरू करने की योजना बना रहे हैं।
गौरतलब है कि इसी हफ्ते संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए ट्रंप ईरान को लेकर सख्त तेवर दिखा चुके हैं। 22 सितंबर को दिए अपने भाषण में उन्होंने कहा था कि उनके सामने एक बड़ा फैसला है कि या तो ईरान के साथ ऐसा समझौता हो जिससे वह दोबारा खड़ा होकर मिडिल ईस्ट का सबसे ताकतवर मुल्क बन जाए, या फिर इस्लामिक रिपब्लिक को पूरी तरह खत्म कर दिया जाए ताकि वह आगे कभी किसी को नुकसान न पहुंचा सके।
हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा था कि उन्हें उम्मीद है कि चुनाव के बाद कोई समझौता हो ही जाएगा। दूसरी तरफ, इससे एक दिन पहले यानी गुरुवार को ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने संयुक्त राष्ट्र में मौजूद पत्रकारों को बताया था कि उनके मुल्क ने सात दिन की एक योजना अमेरिका के सामने रखी है, ताकि पश्चिम एशिया में जारी तनाव को खत्म किया जा सके। इस योजना के तहत होर्मुज को फिर से खोलने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर विस्तृत बातचीत शुरू करने की बात कही गई थी।
अराघची ने यह भी बताया कि यह प्रस्ताव जून महीने में अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते जैसा ही है, और उन्हें उम्मीद थी कि यह डील मिडटर्म चुनावों से पहले ही हो जाएगी।जर्मनी के विदेश मंत्री योहान वाडेफुल के साथ हुई मुलाकात में भी अराघची ने अमेरिका के सामने अपनी शर्तें साफ तौर पर रखने की बात दोहराई।
उनका कहना था कि क्षेत्र में शांति बहाल करने के लिए जरूरी है कि अमेरिका अपनी दखलअंदाजी और आक्रामक रवैया बंद करे। उन्होंने यह भी दोहराया कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर बातचीत के लिए हमेशा तैयार रहा है और उसकी नीयत पर कोई शक नहीं होना चाहिए।
इस बीच फॉक्स न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने जून में हुए समझौते के टूटने का ठीकरा सीधे अमेरिका पर फोड़ा। उनका कहना था कि दोनों देशों के बीच बाकायदा एक फ्रेमवर्क पर सहमति बनी थी और होर्मुज को बिना किसी वजह के बंद भी नहीं किया गया था।
बावजूद इसके अमेरिका ने बातचीत का रास्ता छोड़कर सीधे हमले का विकल्प चुना। पेजेशकियन ने यह भी दावा किया कि इन हमलों में ईरान के वैज्ञानिकों, सैन्य कमांडरों और यहां तक कि सुप्रीम लीडर तक को निशाना बनाया गया।

