सांसारिक दुःखों से मुक्ति के लिए वास्तविक सुख को समझना जरूरी: मुनि विवर्धनसागर

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कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में गणधर मुनि विवर्धनसागर महाराज ने शनिवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए द्रव्यसंग्रह की गाथा क्रमांक 11 की व्याख्या की।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक सम्प्रदाय ने अपने मत की पुष्टि के लिए एकांत दृष्टि को अपनाया और अनेकांत को स्वीकार नहीं किया, जिससे मिथ्या मान्यताएं उत्पन्न हुईं।

उन्होंने कहा कि यदि किसी भी मत को अपेक्षा दृष्टि से समझा जाए तो वही बात सम्यक रूप में ग्रहण की जा सकती है। इसलिए सत्य को व्यापक और अनेकांत दृष्टि से समझना आवश्यक है।

मुनिश्री ने कहा कि इस संसार में विभिन्न प्रकार के अनंत जीव पाए जाते हैं। आधुनिक विज्ञान भी समय के साथ जीवों के संबंध में नई जानकारियों तक पहुंचा है।

वैज्ञानिक जगदीशचंद्र बसु ने अपने प्रयोगों के माध्यम से वनस्पतियों में संवेदनशीलता का प्रतिपादन किया। जैन दर्शन के अनुसार पृथ्वीकाय, जलकाय, अग्निकाय, वायुकाय और वनस्पतिकाय जीव स्थावर जीवों की श्रेणी में आते हैं। इन्हें एकेंद्रिय जीव कहा जाता है, क्योंकि इनमें केवल स्पर्शन इंद्रिय होती है।

मुनिश्री ने कहा कि संसार के दुःखों से मुक्ति पाने के लिए वास्तविक सुख को समझना आवश्यक है। घर, गाड़ी, आभूषण, पुत्र-पत्नी और अन्य भौतिक वस्तुओं में वास्तविक सुख नहीं होता। मोह के कारण मनुष्य इन वस्तुओं में सुख की कल्पना करता है।

वास्तव में वस्तुओं में न तो सुख होता है और न ही दुःख। अपने मोह और कर्मों के कारण जीव स्वयं को सुखी या दुःखी अनुभव करता है। आत्मस्वरूप को पहचानकर और कर्मबंधनों से मुक्त होकर जीव शुद्ध एवं मुक्त अवस्था को प्राप्त कर सकता है।

धर्मसभा में पूर्व न्यायाधीश जैनेंद्र जैन, महावीर बड़ला, मनोज मित्तल, आशीष ठोला, विजय सेठी, संदीप बंसल सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं समाजजन उपस्थित रहे।