नई दिल्ली। HSBC के फ्लैश परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) सर्वे के अनुसार, सितंबर में भारत के सर्विस सेक्टर की बिजनेस एक्टिविटी तीन महीने के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई, क्योंकि मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस, दोनों सेक्टर में आउटपुट में सुधार हुआ। S&P ग्लोबल द्वारा तैयार किया गया यह इंडेक्स बढ़कर 56.5 हो गया, जो अगस्त में चार साल के निचले स्तर 54.3 से सुधरा है।
यह लगातार 62वें महीने 50 के उस निशान से ऊपर बना रहा जो विस्तार और गिरावट के बीच का अंतर बताता है। सर्वे में बताया गया कि सितंबर के दौरान भारत के प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों में कुल नए बिजनेस में तेजी से बढ़ोतरी दर्ज की गई, क्योंकि दोनों सेक्टर में मांग में सुधार हुआ और मैन्युफैक्चरर्स ने ज्यादा सुधार दिखाया। इसमें आगे कहा गया, “बिक्री में बढ़ोतरी सर्विस कंपनियों द्वारा दर्ज की गई बढ़ोतरी से ऊपर बनी रही और सात महीने के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई।”
मार्केटिंग की कोशिशों से सर्विस प्रोवाइडर्स को मिलने वाले ऑर्डर में बढ़ोतरी हुई; प्रॉपर्टी, ट्रांसपोर्ट, ट्रैवल, सॉफ्टवेयर और डिजिटल सॉल्यूशंस की मांग बढ़ी। S&P के अनुसार, सामान बनाने वाली कंपनियों ने एल्युमीनियम, इलेक्ट्रॉनिक्स, खाने-पीने की चीजों, दवाओं और नए प्रोडक्ट मॉडल की मांग में तेजी देखी। HSBC फ्लैश इंडिया मैन्युफैक्चरिंग PMI अगस्त के 52.8 से बढ़कर सितंबर में 55.7 हो गया।
फ्लैश इंडिया सर्विसेज PMI बिजनेस एक्टिविटी इंडेक्स 54.1 से बढ़कर 55.8 हो गया। HSBC की चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी ने कहा, “मैन्युफैक्चरिंग में तेज़ी की वजह से प्राइवेट सेक्टर की गतिविधियों में तेजी आई। आउटपुट और नए घरेलू ऑर्डर तेजी से बढ़े। मिडिल ईस्ट में फिर से बढ़े तनाव के कारण कंपनियों ने अनिश्चितताओं से निपटने के लिए सुरक्षा उपाय बनाने शुरू कर दिए हैं।
नए एक्सपोर्ट ऑर्डर में बढ़ोतरी जारी रही, लेकिन इसके बढ़ने की रफ्तार पिछले तीन साल में सबसे धीमी रही। सितंबर में कुल मिलाकर रोजगार में बढ़ोतरी हुई, क्योंकि प्रोडक्शन और नए ऑर्डर बढ़ने से कंपनियों ने ज्यादा लोगों को काम पर रखा। सर्वे में कहा गया, “मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस, दोनों सेक्टर में नौकरियां बढ़ीं और बढ़ोतरी की रफ्तार लगभग एक जैसी रही।”
प्राइवेट सेक्टर में इनपुट लागत में बढ़ोतरी की रफ्तार जनवरी के बाद से सबसे निचले स्तर पर आ गई। S&P ने कहा, “सर्विस कंपनियों पर लागत का दबाव कम होने से मैन्युफैक्चरर्स की लागत में हुई बढ़ोतरी का असर खत्म हो गया। जिन कंपनियों ने कुल लागत के बोझ में बढ़ोतरी की बात कही, उन्होंने इसकी वजह इलेक्ट्रिकल कंपोनेंट्स, खाने-पीने की चीजों, ईंधन, धातुओं, दवा बनाने वाले सामान और टेक्नोलॉजी रिसोर्स पर ज्यादा खर्च को बताया।”
सितंबर में आर्थिक गतिविधियों ने पकड़ी रफ्तार
सितंबर में कंपोजिट लेवल पर बिक्री की कीमतों में बढ़ोतरी लगभग वैसी ही रही। जहां फैक्ट्री गेट चार्ज में तेजी से बढ़ोतरी देखी गई, वहीं सर्विस कंपनियों के चार्ज में बढ़ोतरी की रफ्तार धीमी रही। भंडारी ने आगे कहा, “इनपुट की खरीद में तेजी आई और तैयार माल के स्टॉक का इंडेक्स अब साढ़े 11 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर है।

