संयम, आत्मशुद्धि और सद्संगति आध्यात्मिक उन्नति का आधार: मुनि विवर्धनसागर

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कोटा। संत की संगति करें, क्योंकि मनुष्य को भगवत्ता की ओर बढ़ने के लिए संयम और आत्मशुद्धि के मार्ग पर चलना आवश्यक है। यह उद्बोधन गणधर मुनि विवर्धनसागर महाराज ने बुधवार को रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में दिया।

गणधर मुनि ने कहा कि दिगम्बर मुनि अवस्था में ही पूर्ण भगवत्ता प्राप्त की जा सकती है, लेकिन जब तक वह अवस्था प्राप्त न हो, तब तक श्रावक धर्म का पालन करते हुए अणुव्रतों के माध्यम से क्रमशः मोक्षमार्ग की ओर आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने संयम, आत्मशुद्धि और सद्संगति को आध्यात्मिक उन्नति का आधार बताया।

प्रवर्तक मुनि विश्वनायक महाराज ने प्रवचन में कर्म सिद्धांत की सूक्ष्म विवेचना करते हुए कहा कि व्यवहार नय की दृष्टि से कर्म बंध के कारण जीव मूर्तिक माना जाता है, जबकि निश्चय नय से जीव अमूर्तिक है। कर्म आठ प्रकार के होते हैं और संसारी जीव के साथ इनमें से सात कर्मों का बंध निरंतर होता रहता है।

उन्होंने कहा कि संसार में जीवों के बीच दिखाई देने वाली विभिन्न प्रकार की विषमताएं उनके पूर्वजन्म के कर्मों का परिणाम हैं। किसी के पास धन-संपत्ति अधिक है तो कोई अभाव में जीवन व्यतीत करता है, किसी की स्मरण शक्ति प्रखर है तो किसी की कमजोर, कोई उच्च कुल में जन्म लेता है तो कोई निम्न कुल में। इसी प्रकार कोई मनुष्य, कोई तिर्यंच, कोई नारकी तो कोई देवगति को प्राप्त होता है। इन सभी अवस्थाओं के पीछे पूर्व में किए गए कर्मों का सिद्धांत कार्य करता है।

धर्मसभा में सकल समाज अध्यक्ष प्रकाश बज, महामंत्री पदम बड़ला, राजमल पटौदी, बसंती लाल पाटनी, महावीर सदारी वाले, महावीर बड़ला, निर्मल अजमेरा, महावीर लुंगिया, पूर्व न्यायाधीश जैनेन्द्र, सुरेश देई वाले, राजेंद्र बगड़ा, स्वतंत्र पाटनी, नितेश खटोड़ सहित गुरु सेवा संघ परिवार के सदस्य एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।