कोटा। कुन्हाड़ी स्थित ऋद्धि-सिद्धि नगर के चंद्रप्रभु दिगंबर जैन जिनालय में शुक्रवार को आयोजित धर्मसभा में मुनिराजों ने श्रावक धर्म, संयम, जीवदया और आत्मकल्याण का संदेश दिया।
मुनि विश्वास सागर महाराज ने कहा कि श्रावक अपने धार्मिक नियमों और मर्यादाओं का पालन करके जैन धर्म की पहचान और परंपराओं को बनाए रख सकते हैं। जैन दर्शन में जीवदया का विशेष महत्व है।
जिनेंद्र भगवान ने विज्ञान की खोजों से बहुत पहले ही जल में असंख्य सूक्ष्म जीवों की उपस्थिति का वर्णन किया है। उन्होंने कहा कि पानी छानकर उपयोग करना भी जीव रक्षा का महत्वपूर्ण नियम है। प्राचीन समय में यात्रा के दौरान श्रावक छन्ना, लोटा और डोरी साथ रखते थे तथा कुएं के पानी का आवश्यकता के अनुसार ही उपयोग करते थे।
आज नलों से पानी व्यर्थ बहाना और गीजर में बिना छना पानी उपयोग करना जीवदया के सिद्धांतों के विपरीत है। छने हुए पानी की उपयोग की समय-सीमा 48 मिनट बताई गई है। उन्होंने कहा कि जैन कुलाचार की परंपराओं को विस्मृत नहीं करना चाहिए। श्रावक जीवन में छोटे-छोटे नियमों का पालन भी धर्म प्रभावना का बड़ा माध्यम बन सकता है।
विवर्धन सागर महाराज ने आचार्य नेमिचंद्र सिद्धांतिदेव की रचनाओं का संदर्भ देते हुए आस्रव तत्व की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि आस्रव के माध्यम से पुण्य और पाप कर्मों का बंध होता है। सांसारिक राग-द्वेष की परिणति से स्वयं को हटाकर देव, शास्त्र और गुरु के प्रति अनुराग बढ़ाना चाहिए, क्योंकि यही आत्मकल्याण और निर्माण का मार्ग प्रशस्त करता है।

