कोटा। ‘विराग वर्धन वर्षायोग-2026’ के अंतर्गत गणधर मुनि विवर्धनसागर महाराज ने शुक्रवार को धर्मसभा में कहा ‘यह मेरा है’, ‘मैंने किया’ और ‘मैं ऐसा हूं’ जैसे भावों में उलझकर मनुष्य संसार में भटकता रहता है।
न मकान हमारा है, न शरीर हमारा है, वास्तविक रूप से आत्मा ही हमारी है। जब तक मनुष्य स्वयं को पर पदार्थों का कर्ता मानता रहेगा, तब तक संसार के बंधन से मुक्त होना कठिन है।
धर्म के निकट आते हुए हमें कर्ता भाव को छोड़कर आत्मा के शुद्ध स्वरूप की ओर बढ़ना चाहिए। बाहरी संकल्प-विकल्पों को कम करते हुए आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ना ही साधना का उद्देश्य है।
मंदिर समिति के अध्यक्ष राजेंद्र गोधा एवं सचिव पंकज खटोड़ ने बताया कि कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की और मुनिश्री के मंगल प्रवचन का लाभ लिया।

