नई दिल्ली। Pulse Production: सबसे बड़ा दाल उत्पादक होने के बावजूद घरेलू मांग पूरी करने और आयात पर निर्भरता घटाने की चुनौती बनी हुई है। इसी चुनौती से निपटने के लिए पिछले साल केंद्र सरकार ने दालों में आत्मनिर्भरता मिशन की शुरुआत की थी।
मिशन के एक साल पूरे होने पर सरकार ने दाल उत्पादन, दलहन फसलों का रकबा और प्रति हेक्टेयर पैदावार के बेहतरीन आंकड़े पेश किये हैं। हालांकि सरकार के इन आंकड़ों पर दलहन कारोबारियों ने सवाल खड़े करते हुए कहा है कि फिलहाल आत्मनिर्भरता की बात करना जल्दबाजी है।
घरेलू उत्पादन बढ़ाने, किसानों की आमदनी सुधारने और देश के लिए प्रोटीन से भरपूर भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ विदेशी मुद्रा बचाना के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने 11 अक्टूबर 2025 को 11,440 करोड़ रुपये के ‘दालों में आत्मनिर्भरता मिशन’ की शुरुआत की थी।
11 अक्टूबर 2026 को इस मिशन का एक साल पूरा हो गया है। इस मिशन का लक्ष्य वर्ष 2030-31 तक देश में दालों का उत्पादन बढ़ाकर 350 लाख टन करना और विदेशों से दालों के आयात पर निर्भरता कम करना है।
सरकार का कहना है कि मिशन के तहत अरहर, उड़द और मसूर की खेती को बढ़ावा देने के साथ किसानों को बेहतर बीज, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और सरकारी खरीद की सुविधा देने पर जोर दिया जा रहा है।
मिशन के छह साल के दौरान 87.5 लाख मुफ्त बीज किट बांटने और 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। रबी 2025-26 में 9.25 लाख बीज किट बांटे जाने की जानकारी दी गई है।
सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, देश में वर्ष 2025-26 के दौरान दालों का उत्पादन बढ़कर 274.09 लाख टन हो गया। वर्ष 2024-25 में यह 256.83 लाख टन था। दालों की खेती का रकबा भी बढ़ा है। वर्ष 2024-25 में दालों की खेती 277.20 लाख हेक्टेयर में हुई थी, जो 2025-26 में बढ़कर 286.46 लाख हेक्टेयर हो गई। इस दौरान प्रति हेक्टेयर औसत उपज में भी सुधार हुआ।
वर्ष 2024-25 में दालों की औसत उत्पादकता 926 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी, जो 2025-26 में बढ़कर 957 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल देश के प्रमुख दाल उत्पादक राज्यों में शामिल हैं।
दालों के आयात में कमी, निर्यात बढ़ा
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024-25 में भारत ने 46,427.60 करोड़ रुपये की दालों का आयात किया था। वर्ष 2025-26 में आयात का मूल्य घटकर 31,793.59 करोड़ रुपये रह गया। इस तरह आयात मूल्य में 31.52 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। दूसरी ओर, दालों के निर्यात में बढ़ोतरी हुई।
वर्ष 2024-25 में भारत ने 855 मिलियन डॉलर की दालों का निर्यात किया था, जो वर्ष 2025-26 में बढ़कर 969.53 मिलियन डॉलर हो गया। इस दौरान कुल 10.01 लाख टन दालों का निर्यात किया गया। भारत से दालों के प्रमुख खरीदार देशों में चीन, संयुक्त अरब अमीरात , बांग्लादेश, अमेरिका और श्रीलंका शामिल हैं।
सरकार की तरफ से दाल उत्पादन, रकबा, आयात निर्यात के जो आंकड़े पेश किये गए उन पर कारोबारी संगठनों ने सवाल खड़े किये हैं। व्यापारियों का कहना है कि आंकड़े देखने के बाद स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि बढ़े हुए बुवाई क्षेत्र और अपेक्षित उत्पादकता के बावजूद उत्पादन में वृद्धि क्यों नहीं हो पाई? यदि वास्तव में बुवाई का रकबा बढ़ा होता, उत्पादकता में सुधार आया होता और उत्पादन में अपेक्षित वृद्धि हुई होती, तो आज भारत की स्थिति कहीं बेहतर होती और दालों के आयात की आवश्यकता में भी उल्लेखनीय कमी आनी चाहिए थी।
आत्मनिर्भरता की बात करना जल्दबाजी
एग्री फॉर्मर एंड ट्रेड्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सुनील बलदेवा कहते हैं कि वर्ष 2025-26 को दालों के क्षेत्र में उपलब्धियों का वर्ष बताने से पहले वास्तविक आंकड़ों की समीक्षा आवश्यक है। भले ही उत्पादन में गिरावट के पीछे प्राकृतिक परिस्थितियां और मौसम प्रमुख कारण रहे हों, लेकिन परिणाम के स्तर पर इसे सकारात्मक उपलब्धि नहीं कहा जा सकता।
इस वर्ष दालों के मामले में आत्मनिर्भरता की बात करना जल्दबाजी होगी। इस वर्ष अल नीनो की आशंकाओं और कम बारिश के प्रभाव को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि बारिश सामान्य से लगभग 14 प्रतिशत कम रही है, तो इसका असर फसलों की उत्पादकता और उत्पादन पर पड़ना स्वाभाविक है। खरीफ की फसलों को मौसम की चुनौतियों का सामना करना पड़ा है और आगे रबी की बुवाई पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है।
350 लाख टन दाल उत्पादन का लक्ष्य
सरकार ने वर्ष 2030-31 तक दालों का उत्पादन बढ़ाकर करीब 350 लाख टन करने का लक्ष्य रखा है। इसके साथ ही प्रति हेक्टेयर औसत उपज को बढ़ाकर 1,130 किलोग्राम करने की योजना है। मिशन के तहत दालों की खेती का रकबा 35 लाख हेक्टेयर बढ़ाया जाएगा। इसे वर्ष 2030-31 तक कुल 310 लाख हेक्टेयर तक पहुंचाने का लक्ष्य है। इसके लिए देश के 489 जिलों में क्लस्टर आधारित खेती को बढ़ावा दिया जाएगा।
स्थापित की जाएंगी 1000 दाल मिलें
दालों की पैदावार बढ़ाने के साथ उनके भंडारण, प्रसंस्करण और बाजार तक पहुंच को मजबूत करने के लिए देशभर में 1,000 दाल प्रसंस्करण इकाइयां (दाल मिलें) स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। पहले चरण में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 528 प्रसंस्करण इकाइयां आवंटित की जा चुकी हैं। वहीं, प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना के तहत दाल प्रसंस्करण से जुड़ी 23 इकाइयों को मंजूरी दी गई है, जिनमें से 18 इकाइयां पूरी हो चुकी हैं। इन इकाइयों से दालों के प्रसंस्करण की क्षमता बढ़ाने और किसानों की उपज को बाजार तक पहुंचाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

