मुनि विवर्धनसागर ने द्रव्य संग्रह की कारिकाओं से समझाया जैन दर्शन

0
7

कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में गणधर विवर्धनसागर महाराज ने मंगलवार को धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए व्यसंग्रह की कारिकाओं के माध्यम से पुद्गल, अणु, स्कंध और धर्म द्रव्य के स्वरूप एवं उनके कार्यों को समझाया।

मुनिश्री ने द्रव्यसंग्रह की 16वीं कारिका का उल्लेख करते हुए बताया कि पुद्गल की अनेक पर्यायें होती हैं। जीव की शुद्ध पर्याय सिद्ध अवस्था है, जबकि पुद्गल में स्पर्श, रस, वर्ण और गंध आदि गुण पाए जाते हैं। स्निग्ध और रूक्ष गुणों के कारण परमाणुओं में परस्पर बंध होता है। समान शक्ति वाले परमाणुओं में बंध नहीं होता, जबकि भिन्न शक्ति वाले परमाणुओं में बंध की प्रक्रिया होती है।

मुनिश्री ने पुद्गल की अन्य पर्यायों का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रकाश के मार्ग में अवरोध उत्पन्न होने पर छाया बनती है। सूर्य का प्रकाश आतप तथा चंद्रमा और जुगनू का प्रकाश उद्योत कहलाता है। उन्होंने मूर्त और अमूर्त द्रव्यों का अंतर भी स्पष्ट किया। स्पर्श, रस, गंध और वर्ण वाले द्रव्य मूर्त होते हैं, जबकि जीव, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाश और काल अमूर्त द्रव्यों की श्रेणी में आते हैं।