कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए गणधर मुनि विवर्धनसागर महाराज ने कहा कि जीव जब आठों कर्मों का पूर्ण क्षय कर देता है, तभी वह कर्मबंधन से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता है और अनंत सुख की अवस्था में पहुंचता है।
उन्होंने कहा कि कर्मों के नष्ट होने के बाद जीव का स्वभाव ऊर्ध्वगमन है। मुक्त जीव लोक के ऊर्ध्व भाग में स्थित सिद्धशिला तक पहुंचता है और वहीं स्थिर हो जाता है। सिद्धशिला वह पवित्र स्थान है, जहां संसार के समस्त मुक्त जीव जाकर विराजमान होते हैं। इसके आगे जीव का गमन संभव नहीं होता।
उन्होंने कहा कि ढाई द्वीप की सीमा मनुष्य के लिए विशेष महत्व रखती है। मनुष्य पर्याय में जीव इसी क्षेत्र में धर्मसाधना करते हुए सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र के माध्यम से मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर हो सकता है। जैन दर्शन में सम्यग्दर्शन की प्राप्ति को आत्मकल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया है।
धर्मसभा में सकल समाज के महामंत्री पदम बडला, जैनेंद्र जज, टीकम पाटनी, पारस बज, पदम हरसौरा, पारस लुहाड़िया, कैलाश जैन, महावीर जैन, पारस गोधा सहित मंदिर समिति के सदस्य एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

