कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर स्थित अतिशयकारी चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में गुरुवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए गणधर मुनि विवर्धनसागर महाराज ने अवगाहनत्व गुण को समझाते हुए कहा कि जिस प्रकार एक दीपक के प्रकाश में अनेक दीपकों का प्रकाश समाहित हो सकता है, उसी प्रकार सिद्ध भगवानों में अनंत सिद्धों के लिए अवगाहनत्व का गुण होता है। कर्मों के पूर्ण नाश के बाद जीव संसार के बंधनों से मुक्त होकर सिद्धशिला में स्थित होता है।
गणधर मुनि श्री ने कहा कि भगवान संसार के सभी कार्य पूर्ण कर चुके हैं, इसलिए उनके लिए कोई सांसारिक कार्य शेष नहीं रहता। आत्मस्वरूप के चिंतन से जीव अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान सकता है। उन्होंने श्रद्धालुओं को ‘सिद्धोऽहम्’ और ‘भगवत्स्वरूपोऽहम्’ जैसे भावों के माध्यम से आत्मचिंतन करने की प्रेरणा दी।
धर्मसभा में विमल नांता, विनोद टोरड़ी, राकेश खटोड़, विनोद सिंघल, रमेश बड़जात्या, निर्मल अजमेरा, नितेश खटोड़, महेंद्र सामरिया, पुष्प लुहाड़िया, जंबू गोधा सहित समाजबंधु उपस्थित रहे।

