भारत की कार्बन क्रेडिट स्कीम को यूके से मंजूरी, जानिए क्या होगा फायदा

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नई दिल्ली। Carbon credit scheme: यूके ने भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम को अपने कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म के तहत एक योग्य कार्बन प्राइसिंग मैकेनिज्म के तौर पर मान्यता दी है।

इस कदम से UK में ज्यादा कार्बन उत्सर्जन वाले सामान बेचने वाले भारतीय एक्सपोर्टर्स पर कार्बन से जुड़े टैक्स का बोझ कम हो सकता है। UK ट्रेजरी ने बिजली मंत्रालय के तहत आने वाले ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी को इस मान्यता के बारे में जानकारी दी है।

UK के नियमों के तहत, जो इंपोर्टर्स CBAM के दायरे में आने वाले भारतीय सामान को देश में लाते हैं, वे भारत के CCTS के तहत उन सामानों पर पहले से चुकाई गई प्रभावी कार्बन कीमत के लिए राहत का दावा कर सकते हैं।

इसका मतलब है कि जब भारतीय एक्सपोर्टर्स के प्रोडक्ट UK में पहुंचेंगे, तो उन्हें दोबारा पूरी कार्बन लागत नहीं उठानी पड़ेगी। एक अधिकारी ने समाचार एजेंसी PTI को बताया, “इससे भारतीय सामान पर प्रभावी CBAM देनदारी कम हो जाएगी, जिससे UK को एक्सपोर्ट करने वाले भारतीय एक्सपोर्टर्स को सीधा फ़ायदा होगा।”

हालांकि, यह राहत अपने आप नहीं मिलेगी। UK में सामान मंगाने वालों को जरूरी सबूत देने होंगे और UK के कानून के तहत वेरिफिकेशन की शर्तों को पूरा करना होगा। राहत की रकम इस बात पर निर्भर करेगी कि सामान पर असल में कितना कार्बन प्राइस लागू होता है और भारत के सिस्टम के तहत पहले ही कितनी कार्बन कॉस्ट चुकाई जा चुकी है।

यह कदम भारत के लिए क्यों जरूरी है? इस मान्यता से भारतीय एक्सपोर्टर्स को दो बार कार्बन कॉस्ट चुकाने से बचने में मदद मिल सकती है पहली बार भारत के कार्बन प्राइसिंग सिस्टम के तहत और दूसरी बार UK के CBAM के तहत।

यूके के CBAM का मकसद देश में आयात होने वाले कुछ ऐसे सामान पर कार्बन कॉस्ट लगाना है जिनके उत्पादन में बहुत ज्यादा कार्बन निकलता है। स्टील, एल्युमीनियम, फर्टिलाइज़र और सीमेंट जैसे प्रोडक्ट पर इसका असर पड़ सकता है।

इसलिए, इन सामानों को बनाने वाले भारतीय प्रोड्यूसर्स के लिए, UK द्वारा CCTS को मान्यता देने से उनकी असल CBAM देनदारी कम हो सकती है। इसका फायदा इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत में असल में कितना कार्बन प्राइस चुकाया गया है और क्या एक्सपोर्टर्स UK की डॉक्यूमेंटेशन और वेरिफिकेशन की जरूरतों को पूरा कर सकते हैं। UK 2027 से अपना CBAM लागू करने की योजना बना रहा है।

स्कीम कैसे काम करती है?
भारत ने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की कीमत तय करने और इंडस्ट्रीज को ऐसे उत्सर्जन को कम करने, उससे बचने या उसे हटाने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए CCTS शुरू किया। यह स्कीम कार्बन क्रेडिट सर्टिफिकेट के जरिए कार्बन क्रेडिट की ट्रेडिंग की सुविधा देती है। इसे एक मार्केट-बेस्ड सिस्टम बनाने के लिए डिजाइन किया गया है जो बिजनेस को अपना उत्सर्जन कम करने के लिए प्रोत्साहित करता है। ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी इस स्कीम को लागू करने के लिए जरूरी फंड का इंतजाम, इसके दायरे में आने वाली संस्थाओं से इकट्ठा की गई फीस और अपने खुद के संसाधनों से करेगा।

तकनीकी बातचीत के बाद मान्यता
यह फैसला भारत के कार्बन मार्केट के डिजाइन और उसे लागू करने को लेकर दोनों देशों के बीच तकनीकी स्तर पर हुई बातचीत के बाद लिया गया है। यह UK के उस नज़रिए के भी अनुरूप है जिसमें उन आयातित सामानों पर राहत दी जाती है जिन पर उनके मूल देश में पहले ही कार्बन की कीमत (कार्बन प्राइस) लागू हो चुकी है। इसका मकसद एक ही कार्बन लागत को दो बार लगाने से बचना है। भारत और UK, ‘UK-इंडिया एनर्जी मेमोरैंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग’ और ‘पार्टनरशिप फॉर मार्केट इम्प्लीमेंटेशन’ के जरिए कार्बन मार्केट के डिजाइन और उसे लागू करने पर बातचीत जारी रखेंगे। दोनों देश कार्बन की कीमत तय करने और इस बात पर भी बातचीत जारी रखने पर सहमत हुए हैं कि भारत का CCTS, UK के CBAM नियमों के साथ कैसे काम करेगा।

भारत-UK व्यापार संबंध
भारत और UK ने इस साल 15 जुलाई को कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक एंड ट्रेड एग्रीमेंट (CETA) पर हस्ताक्षर किए। 2025-26 में दोनों देशों के बीच सामान का व्यापार $25.1 बिलियन था, जबकि 2024 में सेवाओं का द्विपक्षीय व्यापार $35.4 बिलियन तक पहुंच गया। इस समझौते के तहत, भारत के लिए एक मुख्य फायदा यह है कि UK ने कई प्रमुख प्रोडक्ट कैटेगरी पर इंपोर्ट ड्यूटी (आयात शुल्क) खत्म करने का फैसला किया है।

प्रोसेस्ड फ़ूड पर 70 प्रतिशत तक, समुद्री उत्पादों पर 21.5 प्रतिशत, इंजीनियरिंग के सामान और ऑटो कंपोनेंट्स पर 18 प्रतिशत, चमड़े और फुटवियर पर 16 प्रतिशत, टेक्सटाइल और कपड़ों पर 12 प्रतिशत, और केमिकल और फार्मास्यूटिकल्स पर 8 प्रतिशत तक की ड्यूटी को घटाकर जीरो कर दिया जाएगा। हालांकि, भारत ने कई संवेदनशील सेक्टर को इस समझौते से बाहर रखा है। इनमें डेयरी उत्पाद, अनाज, मोटे अनाज (मिलेट्स), खाने का तेल, तिलहन, सेब और कई तरह की सब्जियां शामिल हैं।