प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि भरण-पोषण की कार्यवाही में कोई पत्नी जानबूझकर अपनी वास्तविक आय छिपाती है तो उसके गुजारा भत्ता के दावों का नए सिरे से मूल्यांकन किया जाना आवश्यक है।
कोर्ट ने पत्नी के दावे को सही वित्तीय जानकारी के आधार पर नए सिरे से तय करने के लिए वापस ट्रायल कोर्ट भेज दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति अचल सचदेव ने दिया है।
विवाद दिसंबर 2010 में संपन्न हुए विवाह से जुड़ा है। वैवाहिक कलह और दहेज की मांग तथा क्रूरता के आरोपों के बाद पत्नी अपने बच्चों के साथ अपने मायके में रहने लगी। इसके बाद उसने एडिशनल फैमिली जज इटावा के समक्ष भरण-पोषण के लिए प्रार्थना पत्र दिया।
फैमिली कोर्ट ने उसका प्रार्थना पत्र स्वीकार कर लिया और पति को निर्देश दिया कि पत्नी को आठ हजार रुपये और उनके नाबालिग बेटे को पांच हजार रुपये प्रतिमाह का भुगतान करे।
इस आदेश से असंतुष्ट होकर पति ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका की। पत्नी ने भी भरण-पोषण राशि बढ़ाने की मांग करते हुए पुनरीक्षण याचिका की। पति के वकील ने तर्क दिया कि पत्नी ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाकर भरण-पोषण का आदेश प्राप्त किया है।
फैमिली कोर्ट के समक्ष संपत्ति और देनदारियों की जानकारी के साथ हलफनामे में पत्नी ने अपनी आय शून्य घोषित की थी जबकि उसी अवधि के दौरान उसने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में दिए हलफनामे में नेटवर्थ प्रमाणपत्र और आयकर रिटर्न संलग्न किया था।
बताया कि वर्ष 2022-23 के आयकर रिटर्न में लगभग 4,58,570 रुपये (चार्टर्ड अकाउंटेंट के प्रमाणपत्र के अनुसार 4,81,310 रुपये) की वार्षिक आय थी। रेस्तरां चलाने वाले पति ने प्रतिमाह केवल 30,000 रुपये की आय का दावा किया और बेटे को भरण-पोषण का भुगतान करने की इच्छा व्यक्त की लेकिन पत्नी को दी गई राशि पर आपत्ति जताई।
इसके विपरीत पत्नी के वकील ने किसी भी तथ्य को छिपाने से इंकार किया। तर्क दिया कि पत्नी के पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है और वह अपने पिता द्वारा की गई फिक्स्ड डिपाजिट के मामूली ब्याज पर निर्भर है।
कोर्ट ने भरण-पोषण कानूनों के मूल उद्देश्य का हवाला देते हुए कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 सामाजिक न्याय का एक उपाय है जिसका उद्देश्य बेसहारा होने और दर-दर भटकने से रोकना है। यह प्रावधान दंडात्मक नहीं बल्कि सुधारात्मक है, जो यह सुनिश्चित करता है कि अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ पत्नी, बच्चे या माता-पिता को घोर गरीबी में न छोड़ दिया जाए।
साथ ही सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि पति के शुद्ध मासिक वेतन का 25 प्रतिशत जीवनसाथी के भरण-पोषण के लिए एक व्यापक मानदंड है लेकिन यह कोई अनिवार्य फार्मूला नहीं है।
पति की पुनरीक्षण याचिका आंशिक रूप से स्वीकार
कोर्ट ने विरोधाभासी आय की जानकारी का मिलान करने में फैमिली कोर्ट को विफल पाते हुए पति की पुनरीक्षण याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया। फैमिली कोर्ट को तीन महीने के भीतर तर्कसंगत और व्यापक आदेश करने का निर्देश दिया गया है, जिसमें पत्नी की भरण-पोषण बढ़ाने की याचिका पर भी विचार किया जाएगा।

