नई दिल्ली। Stock Market This Week: आने वाला हफ्ता भारतीय शेयर बाजार के निवेशकों के लिए बेहद अहम रहने वाला है। बीते हफ्ते वैश्विक अनिश्चितताओं और पश्चिम एशिया में सुलग रहे तनाव की वजह से घरेलू बाजार में भारी बिकवाली देखने को मिली थी।
सेंसेक्स और निफ्टी जैसे प्रमुख बेंचमार्क सूचकांक अपने छोटे और लंबे दोनों तरह के मूविंग एवरेज से नीचे फिसल गए हैं। इतना ही नहीं, निफ्टी मनोवैज्ञानिक रूप से बेहद जरूरी 24,000 के स्तर को तोड़कर नीचे बंद हुआ, जबकि बैंकिंग शेयरों में बिकवाली का दबाव सबसे ज्यादा नजर आया।
बाजार के जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में बाजार की चाल काफी हद तक वैश्विक घटनाक्रम, कच्चे तेल की कीमतों और कंपनियों के तिमाही नतीजों पर निर्भर करेगी।
बीते हफ्ते बाजार की चाल बिगाड़ने में सबसे बड़ा हाथ पश्चिम एशिया के संकट का रहा, जिसकी वजह से कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) के दाम एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गए। हालांकि हफ्ते के आखिरी दिनों में कीमतों में थोड़ी नरमी जरूर आई, लेकिन इस महीने अब तक तेल करीब 32 फीसदी तक महंगा हो चुका है।
जानकारों का कहना है कि भारत के लिए यह एक चिंताजनक स्थिति है क्योंकि इससे देश का आयात बिल बढ़ेगा और महंगाई पर भी असर पड़ेगा। इसके अलावा, अमेरिका में 10 साल के बॉन्ड की यील्ड बढ़कर 4.7 फीसदी पर पहुंच गई है, जो जनवरी 2025 के बाद का सबसे उच्च स्तर है।
इस वजह से वैश्विक निवेशक जोखिम भरे उभरते बाजारों जैसे कि भारत से अपना पैसा निकालकर सुरक्षित जगहों की तरफ रुख कर रहे हैं। रुपया भी कमजोर होकर अपने ऑल-टाइम लो के करीब पहुंच रहा है।
मास्टर कैपिटल सर्विसेज के चीफ रिसर्च ऑफिसर डॉ. रवि सिंह के अनुसार, तकनीकी रूप से निफ्टी का ढांचा कमजोर हुआ है। निफ्टी के लिए तुरंत सपोर्ट 23,600 के स्तर पर है, और अगर यह टूटता है तो बिकवाली तेज होकर 23,300 तक जा सकती है।
ऊपर की तरफ 24,000 का स्तर एक बड़ी रुकावट बना हुआ है, जब तक यह पार नहीं होता, तब तक ‘हर तेजी पर बिकवाली’ (Sell on rise) की रणनीति ही सही रहेगी। वहीं, बैंक निफ्टी के लिए 56,000 से 56,100 का दायरा अहम सपोर्ट है, और 57,300 पर कड़ा रेजिस्टेंस बना हुआ है।
बाजार के मौजूदा माहौल में निवेशकों का रुख काफी सतर्क नजर आ रहा है। वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही (Q1 FY27) के नतीजे अब पूरी तरह फोकस में आ चुके हैं। बाजार कंपनियों के प्रदर्शन को लेकर बेहद चुनिंदा हो गया है।
जो कंपनियां उम्मीद से बेहतर नतीजे दे रही हैं, उन्हें तुरंत फायदा मिल रहा है, जबकि कमजोर आंकड़े पेश करने वाली कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट देखने को मिल रही है।
विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की तरफ से बिकवाली का सिलसिला जारी है, जिन्होंने पिछले हफ्ते भी कैश मार्केट से हजारों करोड़ रुपये निकाले। हालांकि, घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने लगातार खरीदारी कर बाजार को कुछ हद तक संभालने की कोशिश जरूर की है, लेकिन यह बिकवाली के दबाव को पूरी तरह बेअसर करने के लिए नाकाफी साबित हो रहा है।
कमोडिटी बाजार और सोने का चमकता सितारा
शेयर बाजार की इस सुस्ती के बीच कमोडिटी बाजार में सोने की चमक लगातार बनी हुई है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा नए टैरिफ बढ़ाने के ऐलान और भू-राजनीतिक तनाव के चलते सुरक्षित निवेश के रूप में सोने की मांग में जोरदार तेजी आई है। अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में कोई खास प्रगति न होने और लाल सागर में जहाजों पर हो रहे हमलों के कारण ऊर्जा संकट गहराया हुआ है।
मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड के कमोडिटी एनालिस्ट मानव मोदी का कहना है कि ऊर्जा की बढ़ती कीमतों के कारण महंगाई को लेकर चिंताएं फिर से गहरी हो गई हैं, जिससे अमेरिकी फेडरल रिजर्व की आगामी नीतिगत बैठक पर सभी की निगाहें टिक गई हैं। ब्याज दरों के मोर्चे पर चुनौतियों के बावजूद निवेशक गिरावट पर सोना खरीद रहे हैं और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं से बचने के लिए गोल्ड-बैक्ड ETFs में पैसा लगा रहे हैं।
दूसरी तरफ, आभूषण बाजार की नब्ज को समझने वाले जानकारों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर सोने की कीमतों में तेजी का असर आम ग्राहकों की जेब पर साफ दिखाई दे रहा है। कामा ज्वैलरी के प्रबंध निदेशक (MD) कोलिन शाह का मानना है कि भू-राजनीतिक तनाव और मैक्रोइकॉनमी के दबाव के कारण सोने की कीमतों में लगातार हलचल बनी हुई है।
हालांकि सुरक्षित निवेश के रूप में इसकी मांग लंबी अवधि में मजबूत रहेगी, लेकिन ऊंचे दामों के चलते अब उपभोक्ताओं की पसंद भारी-भरकम गहनों से हटकर हल्के वजन की आधुनिक ज्वैलरी की तरफ ज्यादा शिफ्ट हो रही है। आने वाले सप्ताह में निवेशकों को हर एक ग्लोबल अपडेट और कॉरपोरेट नतीजों पर बहुत बारीकी से नजर रखनी होगी।

