नई दिल्ली। त्योहारी सीजन के दौरान अरहर (तुअर) दाल की कीमतें और बढ़ सकती हैं। वैश्विक बाजार में अरहर के दाम करीब 10 फीसदी बढ़ गए हैं, जिसका असर घरेलू बाजार पर भी पड़ना शुरू हो गया है। घरेलू बाजार में दाल 11 फीसदी तक महंगी हो गई है। दलहन कारोबारियों का कहना है कि दाल की कीमतें तेजी से बढ़ने को तैयार हैं।
इन्हें काबू में करने के लिए सरकार को बफर स्टॉक की दाल तेजी से बाजार में उतारनी होगी। दाल के बढ़ते दाम को लेकर मचे कोहराम के बीच सरकार अगले सप्ताह इस पर कुछ ठोस कदम उठाने की तैयारी कर रही है।
दलहन फसलों की कम पैदावार और अल नीनो संकट गहराने की खबरों के बीच घरेलू बाजार में दाल के दाम हर दिन बढ़ रहे हैं। घरेलू बाजार के साथ अब वैश्विक बाजार में भी दाल महंगी हो गई है। भारत दालों का बड़ा आयातक देश है। खासकर अरहर दाल की आपूर्ति के लिए भारत कई देशों पर निर्भर है।
भारत को सबसे ज्यादा अरहर की आपूर्ति करने वाले अफ्रीकी देशों में उम्मीद से कमजोर फसल की आशंका के कारण वहां कीमतों में 10 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। उत्पादन कम रहने की संभावना के चलते आने वाले महीनों में वैश्विक बाजार में तुअर की उपलब्धता भी प्रभावित हो सकती है, जिसका असर घरेलू बाजार पर भी पड़ेगा।
इंडिया पल्सेज एंड ग्रेन्स एसोसिएशन (IPGA) के चेयरमैन बिमल कोठारी के अनुसार, अफ्रीकी देशों में तुअर की कीमतें करीब 10 रुपये प्रति किलोग्राम बढ़ गई हैं। पहले जो तुअर 65 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास बिक रही थी, वह अब 70-75 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर पहुंच गई है।
शुरुआत में उम्मीद थी कि अफ्रीका में पिछले साल की तुलना में बेहतर फसल होगी, लेकिन अब अनुमान बदल गए हैं। मौजूदा आकलन के अनुसार, उत्पादन पिछले साल से कम रह सकता है, जिससे बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ी हैं।
एग्री ग्रेन ट्रेड एसोसिएशन के अध्यक्ष सुनील बलदेवा कहते हैं कि त्योहारों के समय मांग बढ़ने के लिहाज से सितंबर और अक्टूबर अहम महीने हैं। सरकार को अक्टूबर के दौरान PSS और PSF के तहत जमा किए गए स्टॉक को बाजार में जारी करना शुरू कर देना चाहिए, ताकि आपूर्ति बनी रहे और कीमतें काबू में रहें।
उन्होंने कहा कि अगर सरकार को लगता है कि बाजार में कीमतों में कोई कृत्रिम बढ़ोतरी या सट्टेबाजी हो रही है, तो वह व्यापारियों और मिल मालिकों से सभी दालों के अपने स्टॉक की जानकारी देने के लिए कह सकती है। इसके बाद बाजार को बिगाड़ने वाली गतिविधियों में शामिल लोगों या संस्थाओं के खिलाफ उचित कार्रवाई की जा सकती है।
एग्री फॉर्मर एंड ट्रेड एसोसिएशन के अध्यक्ष सुनील बलदेव कहते हैं कि व्यापारियों के पास इस साल स्टॉक नहीं है, जबकि सरकार के पास 45 लाख टन का बफर स्टॉक है। इसमें 19.5 लाख टन चना, 10 लाख टन तुअर, 9 लाख टन मूंग और 5.6 लाख टन मसूर दाल का स्टॉक है। हमने सरकार से अनुरोध किया है कि वह बाजार में जल्द से जल्द बफर स्टॉक का माल उतारे। जितनी जल्दी बफर स्टॉक की दाल बाजार में आएगी, उतनी जल्दी कीमतें काबू में होंगी। देर करने पर कीमतें और तेजी से बढ़ेंगी, क्योंकि इस समय मांग बहुत ज्यादा है।
मूल्य समर्थन योजना (PSS) के तहत केंद्रीय एजेंसियों की खरीद कुल दाल और तिलहन उत्पादन के 25 प्रतिशत तक सीमित है। साथ ही, PSS संचालन समाप्त होने के नौ महीने के भीतर स्टॉक का निपटान करना होता है। इसका उद्देश्य भंडारण लागत बढ़ने और गुणवत्ता में गिरावट को रोकना है।
उपभोक्ता मामलों के विभाग ने कृषि विभाग से इस नौ महीने की समयसीमा में ढील देने पर विचार करने को कहा है। खास तौर पर 2025-26 सीजन में किसानों से खरीदी गई तुअर और चने के स्टॉक के लिए यह मांग की गई है। विभाग का कहना है कि इससे आगामी खरीफ और रबी फसलों के उत्पादन की स्थिति स्पष्ट होने तक स्टॉक को सुरक्षित रखा जा सकेगा।
आयात शुल्क में हो सकती है कटौती
दाल के दाम कम करने के लिए कारोबारी संगठनों की ओर से आयात शुल्क कम किए जाने की मांग की जा रही है। सरकार अगर आयात शुल्क घटाती है तो इसका फायदा मसूर दाल और पीली मटर को मिल सकता है। हालांकि, चने को इस छूट से बाहर रखा जा सकता है। फिलहाल भारत में मसूर और चने के आयात पर 10 प्रतिशत टैक्स, जबकि पीली मटर पर 30 प्रतिशत आयात शुल्क लगता है। वहीं, अरहर और उड़द के आयात को मार्च 2027 तक शुल्क-मुक्त किया गया है।
अधिकारियों के अनुसार, दालों की खुदरा कीमतों में असामान्य बढ़ोतरी नहीं हुई है और सरकार की स्थिर आयात नीति से घरेलू आपूर्ति को समर्थन मिल रहा है। सरकार ने तुअर और उड़द के शुल्क-मुक्त आयात की नीति को 31 मार्च 2027 तक बढ़ाया है। पीली मटर पर 30 प्रतिशत आयात शुल्क वित्त वर्ष 2026-27 के अंत तक जारी रहेगा, जबकि मसूर पर 10 प्रतिशत शुल्क है। भारत अपनी सालाना दाल खपत का करीब 18-20 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। इसमें तुअर, उड़द, मसूर, पीली मटर और चना शामिल हैं। आयात कनाडा, रूस, ब्राजील, म्यांमार और अफ्रीकी देशों से होता है।
अरहर आयात में 44 प्रतिशत का बड़ा उछाल
भारत मुख्य रूप से मोजाम्बिक, म्यांमार, तंजानिया, सूडान और मलावी जैसे देशों से अरहर का आयात करता है। आंकड़ों के अनुसार, कैलेंडर वर्ष 2026 के शुरुआती सात महीनों (जनवरी से जुलाई) में भारत का तुअर आयात 44 प्रतिशत बढ़कर 5.79 लाख टन पर पहुंच गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि के दौरान 4.01 लाख टन का आयात हुआ था।
इससे पहले कैलेंडर वर्ष 2025 में भी भारत का तुअर आयात 5.42 प्रतिशत बढ़कर 13.25 लाख टन रहा था। इस अवधि में मोजाम्बिक 2.18 लाख टन के साथ भारत का सबसे बड़ा निर्यातक देश बना रहा। इसके बाद म्यांमार से 1.35 लाख टन, तंजानिया से 1.04 लाख टन और सूडान से 68,499 टन से अधिक अरहर का आयात किया गया।
खरीफ 2026 में तुअर की बोआई की स्थिति
ताजा आंकड़ों के अनुसार, खरीफ 2026 सीजन में तुअर की बोआई लगभग 47.25 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले साल 45.95 लाख हेक्टेयर थी। हालांकि, देश के प्रमुख उत्पादक राज्यों में इसका रकबा घटा है। कर्नाटक में बोआई का क्षेत्र 6 प्रतिशत गिरकर 14.16 लाख हेक्टेयर (पिछले साल 15.33 लाख हेक्टेयर) रह गया।
इसी तरह महाराष्ट्र में यह 1.5 प्रतिशत घटकर 12.02 लाख हेक्टेयर (पिछले साल 12.21 लाख हेक्टेयर) रह गया। इसके विपरीत, उत्तर प्रदेश में बोआई का रकबा 33 प्रतिशत बढ़कर 4.95 लाख हेक्टेयर और गुजरात में 11 प्रतिशत बढ़कर 3.3 लाख हेक्टेयर हो गया है। इसके अलावा तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ में भी तुअर की बोआई में बढ़ोतरी देखी गई है।

