सिद्धचक्र मंडल विधान: 512 अर्घ समर्पित कर हुई सिद्ध परमेष्ठी की आराधना

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आत्मचिंतन और प्रतिक्रमण से जीवन होता है श्रेष्ठ: स्वस्ति भूषण माताजी

कोटा। स्वस्ति भूषण माताजी के सानिध्य में स्टेशन दिगम्बर जैन मंदिर में आयोजित सिद्धचक्र मंडल विधान के तृतीय दिवस का शुभारंभ गुरुवार को भक्तिमय एवं आध्यात्मिक वातावरण में हुआ।

श्रद्धालुओं ने शांति धारा, अभिषेक एवं जिनवाणी स्तवन के साथ भगवान जिनेंद्र की आराधना कर विश्व कल्याण एवं आत्मशुद्धि की मंगल कामना की। शाम सिद्ध चक्र विधान मंडल की आरती, मुनिसुब्रतनाथ भगवान का चालीसा , स्तोत्र तथा चैत्य भक्ति, समाधी मरण भक्ति फिर प्रश्नोत्तरी आयोजन भी हुआ।

विधान के दौरान बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं तथा इन्द्र-इन्द्राणियों ने सहभागिता निभाई। सभी ने सामूहिक रूप से 512 अर्घ समर्पित कर अष्ट सिद्धियों के अधिष्ठाता सिद्ध परमेष्ठी की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की। पूरे मंदिर परिसर में मंत्रोच्चार, भक्ति संगीत और जयघोष से आध्यात्मिक वातावरण निर्मित रहा।

अपने प्रवचन में स्वस्ति भूषण माताजी ने कहा कि मनुष्य यदि दूसरों की निंदा और आलोचना करने के बजाय अपनी कमियों को स्वीकार कर उनका सुधार करे, तो जीवन की अनेक समस्याओं का स्वतः समाधान हो सकता है। उन्होंने कहा कि आत्मावलोकन ही आत्मोन्नति का प्रथम कदम है।

गुरुमा ने कहा कि प्रतिक्रमण से मन, वचन और कर्म की शुद्धि होती है। धर्म की दृष्टि से यह पापों का क्षय करता है तथा व्यक्ति को आंतरिक रूप से हल्का और निर्मल बनाता है। उन्होंने कहा कि नियमित प्रतिक्रमण से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं और आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन प्रतिक्रमण का अभ्यास करना चाहिए।