कोटा। संस्कारित नारी केवल परिवार की आधारशिला ही नहीं, बल्कि पूरे घर की दशा और दिशा बदलने में समर्थ होती है। उसके सद्गुण, क्षमाशीलता और धर्मपरायणता से परिवार में संस्कारों का संचार होता है।
यह बात कुन्हाड़ी स्थित ऋद्धि-सिद्धि नगर के चंद्रप्रभु दिगंबर जैन जिनालय में शनिवार को आयोजित धर्मसभा में गणधर मुनि विवर्धन सागर महाराज ने कही। मुनिश्री ने कहा कि नारी में अनेक गुण समाहित होते हैं। वह कार्यों में मंत्री के समान परामर्श देने वाली, आज्ञापालन में दासी के समान, भोजन कराने में माता के समान और क्षमा धारण करने में धरती के समान होती है।
उन्होंने चिंता जताई कि उच्च शिक्षा और आधुनिक जीवनशैली की दौड़ में बड़ी संख्या में युवा धार्मिक संस्कारों से दूर होते जा रहे हैं। जिन परिवारों में पति-पत्नी दोनों नौकरी करते हैं, वहां कई बार पारिवारिक आनंद के स्थान पर आर्थिक उपलब्धियां प्राथमिकता बन जाती हैं।
उन्होंने कहा कि घर में संस्कारित बहू के आने से धार्मिक परंपराएं पुनर्जीवित हो सकती हैं और आहार के लिए चौका लगने जैसी परंपराएं फिर से शुरू हो जाती हैं। श्रावक श्रेष्ठी वीरेन्द्र मारवाड़ा ने प्रवचन के बाद प्रश्नमंच आयोजित करने का सुझाव दिया।

