बाप रे! सोने से भी महंगा है यह आम, कोई यकीन नहीं करेगा

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नई दिल्‍ली। ओडिशा के मलकानगिरी जिले के एक किसान ने कमाल कर दिया है। उन्‍होंने आम की एक ऐसी किस्‍म उगा दी है जो कीमत में सोने को टक्‍कर देती है। आम की इस खास किस्‍म का नाम ‘मियाजाकी’ है।

तमसा गांव के किसान देबा पधियामी ने इस रेयर वैरायटी को उगाने में सफलता हासिल की है। इसे दुनिया की सबसे महंगी आम की किस्मों में से एक बताया जाता है। इंटरनेशनल मार्केट में उम्‍दा क्‍वालिटी के मियाजाकी आम लगभग 3 लाख रुपये प्रति किलो तक की कीमत में बिकते हैं।

अब देबा के बगीचे में आस-पास के गांव के लोगों का तांता लग रहा है। वे इस आम की एक झलक पाने की चाहत में वहां पहुंच रहे हैं। खुद देबा को भी नहीं पता कि उन्‍हें इसे कैसे बेचना है। फिलहाल वह इन आमों की दिन-रात रखवाली करने में जुटे हैं। आइए, यहां देबा पधियामी की पूरी कहानी के बारे में जानते हैं।

मियाजाकी आम मूल रूप से जापान के मियाजाकी प्रांत का है। इसे लोकप्रिय रूप से ‘ताइयो नो तामागो’ के नाम से जाना जाता है। इसका मतलब है – सूरज का अंडा। यह फल अपने गहरे लाल-बैंगनी रंग, भरपूर मिठास और चिकनी बनावट के लिए मशहूर है।

स्थानीय बाजारों में बिकने वाले आमों के उलट जापान में मियाजाकी आमों को एक लग्‍जरी उपज माना जाता है। चुने हुए फलों की बहुत ऊंची कीमतों पर नीलामी होती है। अक्सर इन्हें महंगे तोहफों के तौर पर खरीदा जाता है। अब ओडिशा के तमसा गांव निवासी देबा पधियामी ने इसे अपने यहां उगाने में कामयाबी हासिल की है

देबा पधियामी को आम का यह पौधा लगभग चार साल पहले एक समाज-सेवी से मिला था। ओडिशा की मुश्किल जलवायु में कई सालों तक इस पौधे की देखभाल करने के बाद आखिरकार इस पेड़ पर फल लगने शुरू हो गए हैं। अब किसान का छोटा सा बगीचा इस पूरे इलाके में कौतूहल का केंद्र बन गया है। लोग दूर-दूर से उनके पास पहुंच रहे हैं।

इन आमों पर लोगों का ध्यान जाने से अब डर भी पैदा हो गया है। देबा का कहना है कि उन्‍होंने रात में पेड़ के पास ही सोना शुरू कर दिया है। वजह यह है कि उन्‍हें डर है कि कहीं कोई इस रेयर वैरायटी को चुरा न ले।

टहनियों पर लटकते पकते फलों को देखते हुए वह कहते हैं- ‘मैं आजकल इस बगीचे की रखवाली कर रहा हूं। ये आम बहुत कीमती हैं।’ आस-पास के गांवों के लोग इन अनोखे आमों की एक झलक पाने के लिए इस बगीचे में पहुंच रहे हैं। इससे इस फसल को लेकर उत्साह और चिंता दोनों ही बढ़ गई हैं।

लग्‍जरी मार्केट से जुड़े इस फल को उगाने के बावजूद देबा को अभी तक यह नहीं पता कि अपनी इस उपलब्धि को कमाई में कैसे बदला जाए। उन्‍हें फलों की कीमत तय करने, उनकी पैकिंग करने, उन्हें एक जगह से दूसरी जगह भेजने या फिर ऐसे खरीदारों को ढूंढने के बारे में बहुत कम जानकारी है, जो इन फलों के लिए इतनी ज्‍यादा कीमत चुकाने को तैयार हों।

हालांकि, जापान में मियाजाकी आमों की कीमतें बहुत ज्‍यादा हो सकती हैं। लेकिन, ये कीमतें खेती के सख्त मानकों, ब्रांडिंग और एक्सपोर्ट-क्वालिटी सर्टिफिकेशन से जुड़ी होती हैं। सही मार्केटिंग और सप्लाई चेन के बिना भारत में उगाए गए आमों को अपने-आप ही लाखों रुपये प्रति किलो की कीमत नहीं मिल सकती।

फिलहाल, देबा का फोकस अपने पेड़ पर लटके फलों को बचाने पर है। उन्‍हें पक्का नहीं पता कि ये फल उनकी जिंदगी बदल देंगे या फिर ओडिशा के किसी दूरदराज के गांव की एक अनोखी कहानी बनकर रह जाएंगे।