नई दिल्ली। परीक्षा प्रश्न पत्र लीक होने से छात्रों के गुस्से को शांत करने के प्रयास में सरकार सोमवार सुबह लोक सभा में लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 पेश करेगी। इस विधेयक में फरवरी 2024 में संसद द्वारा पारित कानून के तहत दंड एवं सजा को और कड़ा करने का प्रावधान है।
प्रश्न पत्र लीक होने के मुद्दे पर संसद में चर्चा के लिए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा विपक्ष की पूर्व शर्त थी। सरकार अब मॉनसून सत्र की शेष 14 बैठकों में अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने का प्रयास करेगी। सत्र 13 अगस्त को समाप्त हो जाएगा। 20 से 24 जुलाई तक पहली पांच बैठकें हंगामे के कारण नहीं हो सकी थीं।
सरकार ने नए महिला आरक्षण विधेयक और संबंधित परिसीमन विधेयक को अभी तक सूचीबद्ध नहीं किया है। इन विधेयकों का लाना इस बात पर निर्भर करेगा कि संविधान में संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत जुटाने के लिए सरकार कितनी आश्वस्त है। इस सत्र में सरकार विरोध प्रदर्शन की सफलता से उत्साहित विपक्ष का सामना करेगी। ऐसे में
संसद में सरकार के लिए राह आसान नहीं होगी। कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष विशेष रूप से 20 जुलाई को संसद तक मार्च के दौरान विरोध प्रदर्शन करने वाले छात्रों के खिलाफ कथित पुलिस बर्बरता का विरोध करेगा।
विपक्षी दल उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करेंगे जो छात्रों पर लाठीचार्ज करने और आंसू गैस छोड़ने के अलावा कथित तौर पर पैलेट गन के इस्तेमाल और पुरुष पुलिस कर्मियों द्वारा महिला प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट की घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं।
विपक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा छात्रों से माफी की मांग करेगा। कथित पुलिस बर्बरता के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से स्पष्टीकरण की भी मांग की जाएगी क्योंकि दिल्ली पुलिस और रैपिड ऐक्शन फोर्स उनके मंत्रालय के अंतर्गत आते हैं।
लोक सभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने केंद्रीय गृह मंत्री शाह को पत्र लिखकर प्रदर्शनकारियों पर बर्बर हमले के लिए जवाबदेही मांगी है। उन्होंने पूछा है कि क्या उन्होंने पैलेट गन सहित घातक बल प्रयोग करने का निर्देश दिया था। गांधी ने कहा, ‘सैकड़ों लोगों को गंभीर चोटें आई हैं।
छात्राओं पर पुलिसकर्मियों द्वारा हमला किया गया और जानबूझकर उनके अंगों को निशाना बनाया गया।’ गांधी ने पूछा, ‘क्या लाठियों से छात्रों को पीटते हुए सादे कपड़ों में दिखाई देने वाले लोग पुलिसकर्मी थे या स्वयंसेवक? उनकी तैनाती किसके निर्देश पर हुई थी?’
कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों द्वारा शिक्षा की बढ़ती लागत और शिक्षा के लिए बजट आवंटन में कटौती के मुद्दे भी उठाए जा सकते हैं। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि साल 2014-15 से 2025-26 के बीच घरेलू व्यय आंकड़ों के सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) के विश्लेषण से पता चलता है कि परिवार की आय के मुकाबले शिक्षा लागत में काफी तेजी से बढ़ोतरी हुई है।
गृह मंत्री शाह ने शनिवार शाम को एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए देश, युवा और छात्र किसी भी पद से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। इसके लिए उन्होंने शिक्षा मंत्री प्रधान के इस्तीफे का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा, ‘मोदी सरकार देश के युवाओं की भावनाओं का सम्मान करती है और प्रश्न पत्र लीक को रोकने के लिए आवश्यक उपाय करने के लिए प्रतिबद्ध है।
शाह ने शिक्षा क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सुधार लाने, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के प्रभावी कार्यान्वयन, मातृभाषाओं में परीक्षा की व्यवस्था, पीएम श्री स्कूलों के विस्तार, डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने, कौशल विकास और उद्योग एवं शिक्षा के बीच समन्वय को मजबूत करने में प्रधान के कार्यकाल की सराहना की।
शिक्षा क्षेत्र में काम करने वाले आरएसएस और उसके सहयोगियों को एनईपी के कार्यान्वयन में गहरी दिलचस्पी है। जोशी बचपन से ही आरएसएस से जुड़े रहे हैं, वह शिक्षा क्षेत्र पर संगठन के ध्यान केंद्रित करने को भलीभांति समझते हैं और उनसे अपेक्षा की जाती है कि वह शिक्षा मंत्रालय में प्रधान के काम को आगे बढ़ाएंगे।
प्रधान 26 मई, 2014 से प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली सरकारों के 12 वर्षों में केंद्रीय मंत्रिपरिषद से इस्तीफा देने वाले दूसरे मंत्री हैं। इससे पहले पूर्व विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर ने ‘मीटू’ आंदोलन के बीच यौन कदाचार के आरोपों के बाद 17 अक्टूबर, 2018 को इस्तीफा दे दिया था।
साल 2017 में तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने भी लगातार हुई ट्रेन दुर्घटनाओं की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा की पेशकश की थी। प्रभु ने 23 अगस्त को एक पोस्ट में कहा था कि उन्होंने प्रधानमंत्री से मुलाकात कर इस्तीफा देने की पेशकश की लेकिन प्रधानमंत्री ने उन्हें इंतजार करने के लिए कहा था। बाद में 3 सितंबर, 2017 को केंद्रीय मंत्रिपरिषद में फेरबदल के तहत प्रभु को वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री बनाया गया था।
मोदी के नेतृत्व वाली सरकार जनता के दबाव में निर्णय लेने से कतराती रही है। पिछले 12 वर्षों के दौरान ऐसे कई उदाहरण हैं। मोदी सरकार ने किसान संगठनों द्वारा विरोध विरोध प्रदर्शन के बाद 2015 में भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक को वापस ले लिया था।
आरएसएस से संबद्ध किसान संगठनों ने भी इसका विरोध किया था। अगस्त 2018 में संसद ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों को पलटने के लिए एक विधेयक पारित किया। इन निर्देशों का उसी साल अप्रैल में विरोध हुआ था क्योंकि माना जा रहा था कि इनसे कानून कमजोर हो रहा है।

