कोटा। ईथॉस हॉस्पिटल के चिकित्सकों ने त्वरित चिकित्सकीय हस्तक्षेप करते हुए दो वर्षीय मासूम के फेफड़े में फंसा चना सफलतापूर्वक निकालकर उसकी जान बचा ली। इमरजेंसी ब्रोंकोस्कोपी (Bronchoscopy) के जरिए की गई इस जटिल प्रक्रिया के बाद बच्चे की सांस सामान्य हो गई और कुछ ही दिनों में उसे स्वस्थ अवस्था में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
बारां जिले के अटरू निवासी दो वर्षीय जयेश को सांस लेने में गंभीर तकलीफ, तेज सांस चलने और बेहोशी की हालत में अस्पताल लाया गया। परिजनों ने बताया कि एक दिन पहले चना खाते समय उसके गले में कुछ फंस गया था। जांच में दायां फेफड़ा लगभग पूरी तरह सिकुड़ा हुआ मिला।
एचआरसीटी चेस्ट में दाईं मुख्य श्वासनली में करीब आठ मिलीमीटर का चना फंसा होने की पुष्टि हुई, जिससे फेफड़े तक हवा का प्रवाह लगभग रुक गया था। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अरुण कुमार मेवाड़ा एवं उनकी टीम ने बिना विलंब इमरजेंसी ब्रोंकोस्कोपी की।
प्रक्रिया के दौरान श्वासनली में फंसा चना सुरक्षित निकाल लिया गया। इसके तुरंत बाद बच्चे की सांस सामान्य होने लगी, ऑक्सीजन का स्तर सुधरा और फेफड़े ने दोबारा सामान्य रूप से कार्य करना शुरू कर दिया।
लगातार चिकित्सकीय निगरानी और उपचार के बाद बच्चे की स्थिति में तेजी से सुधार हुआ तथा तीसरे दिन उसे स्वस्थ एवं स्थिर अवस्था में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
डॉ. अरुण कुमार मेवाड़ा ने बताया कि छोटे बच्चों को चना, मूंगफली, मक्का, अंगूर या खिलौनों के छोटे हिस्से जैसी वस्तुएं देते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। इनके श्वासनली में फंसने से कुछ ही मिनटों में जानलेवा स्थिति बन सकती है।
अस्पताल के निदेशक प्रदीप दाधीच ने कहा कि यदि बच्चे को अचानक खांसी, सांस लेने में तकलीफ, सीटी जैसी आवाज या दम घुटने के लक्षण दिखाई दें तो घरेलू उपायों में समय न गंवाकर तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। समय पर उपचार से ऐसे मामलों में गंभीर जटिलताओं और जान के जोखिम को टाला जा सकता है।

