कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में बुधवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए प्रवर्तक मुनि विश्वनायक सागर महाराज ने जीव के शुद्ध स्वरूप और उसके भेद-प्रभेद पर प्रकाश डाला।
मुनि श्री ने कहा कि निश्चयनय की दृष्टि से सिद्ध जीव शुद्ध हैं और संसारी जीव भी अपने द्रव्य स्वरूप से शुद्ध हैं, क्योंकि निश्चयनय केवल शुद्ध द्रव्य को ग्रहण करता है। वहीं व्यवहारनय की दृष्टि से संसारी जीव कर्मों से संयुक्त होने के कारण अनेक अवस्थाओं और भेदों में दिखाई देते हैं। संसार में जीव अनंत हैं और कर्म भी असंख्यात हैं, इसलिए संसारी जीवों में अनेक भेद-प्रभेद पाए जाते हैं।
उन्होंने कहा कि जीव के इन असंख्य भेदों को समझने और व्यवस्थित रूप से जानने के लिए जैन दर्शन में मार्गणा और गुणस्थान की वैज्ञानिक व्यवस्था बताई गई है। यह व्यवस्था जीव की विभिन्न अवस्थाओं को समझने में सहायक है तथा आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जानने का मार्ग प्रशस्त करती है।
धर्मसभा में पदम बड़ला, अशोक सांवला, टीकम पाटनी, मनोज मित्तल, प्रेमचंद दुगेरिया, बसंतीलाल दोषी, धर्मचंद गोधा, पारस बज, जम्बू गोधा, जोनू बाकलीवाल सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

