Saturday, July 11, 2026
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जीएसटी दरों में कटौती का ‘फायदा’ उठाने वाले रेस्टोरेंट्स पर नकेल कसेगी सरकार

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नई दिल्ली। जीएसटी की दरों में कटौती के बाद भी एयरकंडीशन रेस्टोरेंट में खाना खाने वालों को पुरानी दर पर ही बिल चुकाना पड़ रहा है। अब सरकार ऐसे रेस्टोरेंट्स के खिलाफ एक्‍शन लेने की तैयारी कर रही है जो जीएसटी कम होने का फायदा अपने ग्राहकों तक नहीं पहुंचा रहे हैं।

जल्द ही सरकार ऐसे रेस्टोरेंट्स पर कार्रवाई कर सकती है। गौरतलब है कि अभी किसी भी रेस्टोरेंट में मिलने वाले खाने की कीमत तय करने का हक उसके मालिक के पास है। अब जबकि सरकार ने रेस्टोरेंट के बिल पर लगने वाली जीएसटी दर को कम कर दिया है तो इसका फायदा ग्राहकों को कम बिल के रूप में मिलना चाहिए।

लेकिन देश के अधिकांश रेस्टोरेंट ऐसा नहीं कर रहे हैं। वहां जीएसटी की दर भले ही घट गई है, लेकिन रेस्टोरेंट मालिकों ने खाद्य पदार्थों की कीमत बढ़ा दी है, जिससे ग्राहकों को अभी भी ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। जबकि पांच फीसदी से जीएसटी लगने की वजह से बिल राशि कम होनी चाहिए थी।

RBI के कदम से और पारदर्शी तरीके से तय होगी ब्याज दर

नई दिल्ली। बैंकों के ब्याज दर तय करने के तौर- तरीके पर कई बार आपत्तियां जता चुके रिजर्व बैंक ने अब ऐसा कदम उठाया है जो बैंकों को ज्यादा पारदर्शी तरीका अपनाने के लिए मजबूर कर देगा। आरबीआई ने देश के बैंकिंग क्षेत्र में औसत कर्ज की दर को निकालना शुरू किया है।

इसमें बैंक वार कर्ज की दर नहीं दी गई है। अलबत्ता सरकारी बैंक, निजी बैंक और विदेशी बैंकों के दरों को अलग अलग तीन समूह में दिया गया है। लेकिन इससे ग्राहकों को पता चल जाएगा कि औसत ब्याज की दर क्या है।

गुरुवार को आरबीआइ की तरफ से जारी इस सूची में सरकारी बैंकों में औसत कर्ज की दर 10.39 फीसद है। यह दर निजी व विदेशी बैंकों की औसत कर्ज दर से कम है।

आरबीआइ की रिपोर्ट के मुताबिक देखे तो सितंबर, 2017 में देश के बैंकिंग क्षेत्र में ब्याज की औसत दर 10.45 फीसद रही है। सरकारी क्षेत्र से इतर विदेशी बैंकों में औसत कर्ज दर 10.65 फीसद और निजी बैंकों में 10.55 प्रतिशत है। हालांकि इस रिपोर्ट से साफ है कि वर्ष 2012 के बाद से ब्याज दरों में लगातार नरमी का रुख बना हुआ है।

फरवरी, 2012 में देश के बैंकों के लिए कर्ज की औसत दर 12.53 फीसद था। इसमें सितंबर, 2017 तक 2.08 फीसद की कमी आ चुकी है। मगर आरबीआइ मानता है कि ब्याज दरों को नरम बनाने का जितना मौका वह देता है, बैंक उसका पूरा फायदा ग्राहकों को नहीं देते हैं।

इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है कि जनवरी, 2015 में रेपो रेट (वह दर जिस पर बैंक आरबीआई से कम अवधि का कर्ज लेते हैं) 7.75 फीसद थी। अभी यह दर छह फीसद है। रेपो दर अल्पकाल में बैंकों के कर्ज की दरों को तय करने में सबसे अहम भूमिका निभाती है।

इस तरह से देखा जाए तो पिछले ढ़ाई वर्षों में रेपो रेट में 1.75 फीसद की कटौती की गई है, लेकिन इस दौरान कर्ज की दरों में बैंकों ने सिर्फ 1.46 फीसद की रियायत दी है। इसमें से अधिकांश कटौती हाल के महीनों में तब की गई है, जब आरबीआइ ने इस बारे में लगातार बैंकों को फटकार लगाई।

देश में ब्याज दरों का मामला एक बार फिर गर्म है। केंद्र सरकार और उद्योग जगत मंदी को देखते हुए लगातार दबाव बना रहा है कि ब्याज दरों में एकमुश्त बड़ी कटौती की जाए। वहीं, ग्लोबल हालात और देश के भीतर महंगाई को देखते हुए आरबीआई बेहद सावधानी से कदम उठा रहा है।

अक्टूबर में मौद्रिक नीति की समीक्षा के दौरान आरबीआई ने कटौती की मांग को दरकिनार करते हुए ब्याज दरों के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की थी। अब सभी की निगाह दिसंबर के पहले हफ्ते में होने वाली समीक्षा पर है।

हाल के हफ्तों में थोक व खुदरा महंगाई की दर ने सिर उठाया है, जबकि कच्चे तेल की कीमतों में भी तेजी का रुख है। ऐसे में उम्मीद कम है कि केंद्रीय बैंक रेपो रेट में कटौती करेगा।

दलहन की रिकॉर्ड पैदावार, सरकार ने निर्यात पर लगी रोक हटाई

नई दिल्ली । दलहन की कमी दूर करने के लिए किसानों को सरकार के प्रोत्साहन से दालों की पैदावार ने नई ऊंचाइयां छू तो ली लेकिन उनकी यही सफलता अब भारी पड़ने लगी है।

इसी समस्या के समाधान के लिए सरकार ने दालों के निर्यात पर लगी रोक हटा लिया है। लेकिन इससे समस्या के सुलझने पर संदेह है। बाजार में दलहन के मूल्य सुधरने के आसार कम ही हैं। दलहन कारोबारियों के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय दालों की मांग बहुत कम है।

दुनिया के कई देशों में दलहन की खेती सिर्फ भारत की मांग को पूरा करने के लिए की जाती है। लिहाजा घरेलू आपूर्ति बढ़ने अथवा आयात कम होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में दलहन की कीमतें और घटेंगी।

नजीर के तौर पर मटर के आयात पर 50 फीसद आयात शुल्क लगाने के प्रावधान के बाद विश्व बाजार में मटर की कीमत 60 डॉलर प्रति टन कम हो गई हैं। मटर का भाव 300 डॉलर प्रति टन से कम होकर 240 डॉलर रह गया है। दलहन बाजार के जानकारों की मानें तो दलहन की बाकी उपज के आयात पर रोक लगाये बगैर घरेलू बाजारों के मूल्य में सुधार नहीं होने वाला है।

चना, अरहर, उड़द, मसूर और मूंग जैसी प्रमुख दालों के आयात पर कोई रोक-टोक नहीं है। इन जिंसों के आयात को शुल्क मुक्त रखा गया है। सूत्रों का कहना है कि चना आयात जारी है। डेढ़ लाख टन चना किसी भी समय बंदरगाहों पर पहुंच सकता है। सरकार ने विभिन्न दालों पर अलग-अलग प्रावधान कर रखा है। उड़द और मूंग जैसी दालों पर मात्रत्मक प्रतिबंध है।

पिछले दो-तीन सालों से दालों की मांग को पूरा करने के लिए सरकार ने किसानों को भरपूर प्रोत्साहन दिया है। उन्नतशील बीज, प्रौद्योगिकी, खाद, कीटनाशकों की समुचित आपूर्ति के साथ न्यूनतम समर्थन मूल्य में भारी इजाफा होने से दलहन खेती के रकबे में वृद्धि हुई और उत्पादकता में सुधार हुआ। लिहाजा रिकॉर्डतोड़ पैदावार हुई।

सरकार ने पहली बार बफर स्टॉक बनाकर दालों की सरकारी खरीद शुरू की। खरीद होने से जमाखोर और कालाबाजारी करने वालों को करारा धक्का लगा। गेहूं व चावल की खरीद की तर्ज पर 20 लाख टन दलहन की खरीद की गई।

लेकिन दालों की आपूर्ति घरेलू खपत के मुकाबले कहीं अधिक हो गई। इसके बावजूद पैदावार अधिक होने का नुकसान किसानों को उठाना पड़ रहा है।  दालें न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी नीचे पहुंच गई हैं। कीमतों में गिरावट का यह मंजर लगभग सभी राज्यों की मंडियों में देखने को मिल रहा है।

बाजार में कीमतों में सुधार के लिए दालों के आयात पर फिलहाल प्रतिबंध लगाने की जरूरत है। हालांकि सरकार ऐसे सख्त कदम उठाने से पहले पूरी स्थिति की समीक्षा कर रही है।

केंद्र ने खाद्य तेल पर आयात शुल्क दुगना किया

नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए क्रूड पाम ऑयल पर आयात शुल्क बढ़ाकर 30 फीसद कर दिया है जो कि पहले 15 फीसद हुआ करता था। वहीं रिफाइंड ऑयल पर भी आयात शुल्क को 20 फीसद से बढ़ाकर 40 फीसद कर दिया गया है।

सरकार ने यह कदम तेल के सस्ते आयात पर लगाम लगाने के इरादे से उठाया है ताकि तेल की स्थानीय कीमतों में थोड़ा इजाफा हो जो कि किसानों तथा रिफाइनरी के काम में लगी इकाइयों को राहत उपलब्ध करा सके। यह जानकारी सरकार की ओर से जारी किए गए एक नोटिफिकेशन के जरिए सामने आई है।

केन्द्रीय उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीईसी) ने बीते दिन जानकारी दी थी कि सोयाबीन तेल, सूर्यमुखी तेल, कैनोला: सरसों तेल कच्चा तथा रिफाइंड दोनों पर आयात शुल्क बढ़ाया गया है। इसके अलावा सोयाबीन पर भी आयात शुल्क बढ़ाया गया है।

सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी की अध्यक्षता में अंतर-मंत्रालयी समूह और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद पीएमईएसी ने स्थानीय बाजारों में कीमत स्थिति की समीक्षा की थी और खाद्य तेल एवं तिलहनों पर आयात शुल्क बढ़ाने का सुझाव दिया था।

सीबीईसी के अनुसार क्रूड सोयाबीन तेल पर आयात शुल्क दोगुना कर 30 फीसद जबकि रिफाइंड सोयाबीन तेल पर 25 फीसद से बढ़ाकर 40 फीसद किया गया है। क्रूड सोयाबीन तेल पर आयात शुल्क 17.5 फीसद से बढ़ाकर 30 फीसद जबकि रिफाइंड सोयाबीन तेल पर 20 फीसद से बढ़ाकर 35 फीसद कर दिया गया है।

त्योहारी मांग से सोना 325 रुपये महंगा , जानिए अब क्या रहे भाव

नई दिल्ली/ कोटा । दिल्ली सर्राफा बाजार में शनिवार को सोने की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिला। आज सोना 325 रुपए उछलकर 30,775 प्रति दस ग्राम से स्तर पर पहुंच गया।

सोने की कीमतों में इस तेजी की प्रमुख वजह त्यौहारी मांग के तेजी से बढ़ने और मजबूत वैश्विक संकेतों को माना जा रहा है। गौरतलब है कि शुक्रवार को सोना 75 रुपये की कमजोरी के साथ 30450 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर बंद हुआ था।

चांदी में भी आई तेजी: सोने के साथ साथ चांदी की कीमतों में भी तेजी देखने को मिली है। आज चांदी एक बार फिर से 41,000 के पार चली गई। आज चांदी 600 रुपए उछलकर 41,150 रुपए के स्तर पर बंद हुई। इस तेजी की प्रमुख वजह औद्योगिक इकाईयों एवं सिक्का निर्माताओं की ओर से तेज उठान को माना जा रहा है।

व्यापारियों का मानना है कि शादी के मौसम के चलते त्यौहारी मांग को पूरा करने के लिए स्थानीय ज्वैलर्स की ओर से की गई तेज खरीदारी ने सोने की कीमतों में तेजी ला दी है। वहीं कमजोर डॉलर के बीच मजबूत वैश्विक रुख ने खरीदारों के सेंटिमेंट को तेज कर दिया है।

वहीं वैश्विक स्तर पर सिंगापुर में सोना 0.04 फीसद उछाल के साथ 1,755.62 डॉलर प्रति औंस के स्तर पर बंद हुआ, जबकि न्यूयॉर्क में सोना 1.18 फीसद उछलकर 1,293.40 डॉलर प्रति औंस और चांदी 1.32 फीसद उछलकर 17.28 डॉलर प्रति औंस के स्तर पर बंद हुई है।

इसके अलावा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में 99.9 फीसद और 99.5 फीसद सोना 325 रुपए उछलकर क्रमश: 30,775 और 30,625 रुपए प्रति 10 ग्राम के स्तर पर आ गया। आपको बता दें कि सोने की कीमत में बीते दो दिनों के दौरान 175 अंकों की गिरावट देखने को मिली थी। हालांकि गिन्नी के भाव 24700 रुपये प्रति आठ ग्राम के स्तर पर बरकरार रहे हैं।

कोटा सर्राफा
चांदी 40400 रुपये प्रति किलोग्राम।
सोना केटबरी 30550 रुपये प्रति दस ग्राम, सोना 35630 रुपये प्रति तोला। 
सोना शुद्ध 30700 रुपये प्रति दस ग्राम, सोना 35810 रुपये प्रति तोला। 

ट्रैन में कन्फर्म टिकट मिलने की संभावना बढ़ी: अध्ययन

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नयी दिल्ली। भाषा त्यौहारों के दौरान रेल की कन्फर्म टिकट मिलना मुश्किल होता है लेकिन रेलवे द्वारा इस बार दिवाली के दौरान विशेष तथा नई ट्रेनों को चलाने जैसे प्रबंध के कारण प्रतीक्षा सूची के टिकट कंफर्म होने की दर पिछले वर्ष के मुकाबले बढ़ी।

यह बात परामर्श सेवा कंपनी रेलयात्री के अध्ययन में सामने आयी है। एप के जरिये रेल संबंधी तथा अन्य सेवाएं उपलब्ध कराने वाली रेलयात्री.इन के अध्ययन से यह भी पता चलता है कि स्लीपर श्रेणी में पिछले वर्ष की तुलना में इस साल औसतन प्रतीक्षा सूची नीचे आयी है।

अध्ययन रपट के अनुसार दिवाली के अवकाशों के समय देहरादून-हावड़ा दून एक्सप्रेस, पुणे-जम्मू तवी झोलम एक्सप्रेस समेत कई लंबी दूरी की ट्रेनों में टिकट पक्की होने की दर वर्ष 2016 में क्रमशफ् 38.50 प्रतिशत और 52.00 प्रतिशत थी इसके मुकाबले 2017 में इनमें कन्फर्मेशन दर बढ़कर क्रमश: 60.40 प्रतिशत और 64. 90 प्रतिशत हो गयी।

इसी तरह वहीं छत्रपति टर्मिनस से हावड़ा सुपरफाट मेल गया के रास्ते में टिकट पक्की होने की दर 2016 में 40.0 प्रतिशत के मुकाबले 2017 में दिवाली के दौरान 50.40 प्रतिशत हो गयी है। इसी प्रकार, पुणे-जम्मूतवी झाोल एक्सप्रेस, पुणे-दानापुर सुपरफास्ट एक्सप्रेस और बैंगलोर.दानापुर संघमित्रा सुपरफास्ट एक्सप्रेस में भी टिकट पक्की होने की स्थिति सुधरी।

अध्ययन के अनुसार रेलवे में टिकट निरस्त कराने की दर पिछले दो साल से 18 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि शेष प्रतीक्षा सूची के यात्रियों को पक्की टिकट मिली। वर्ष 2015 में प्रतीक्षा सूची के टिकटों के निरस्तीकरण की दर 25.5 प्रतिशत थी जो 2016 और 2017 में 18 प्रतिशत पर बरकरार है।

रेल यात्री के सह संस्थापक और मुख्य कार्यपालक अधिकारी मनीष राठी ने कहा, हर साल दीवाली एवं अन्य त्यौहारों के दौरान रेल टिकट की भारी मांग होती है और कई यात्री को पक्की टिकट नहीं मिल पाती। हालांकि आंकड़ों से पता चलता है कि कुछ ही लोगों को अपने टिकट निरस्त करने पड़े।

अध्ययन में यह भी कहा गया है स्लीपर श्रेणी में पिछले वर्ष की तुलना में इस साल औसतन प्रतीक्षा सूची नीचे आयी है।इसके अनुसार अवकाश के दौरान , कोटा-पटना एक्सप्रेस में स्लीपर श्रेणी में 2016 में औसतन प्रतीक्षा सूची 813 थी जो 2017 में घटकर 735 पर आ गयी।

वहीं भागलपुर-मुंबई लोकमान्य तिलक सुपर फास्ट एक्सप्रेस में प्रतीक्षा सूची 2017 में घटकर 727 पर आ गयी जो 2016 में 736 थी। इसी प्रकार, अहमदाबाद-हरिद्वार योग एक्सप्रेस, यंशवंतपुर-हावड़ा सुपरफास्ट एक्सप्रेस जैसे ट्रेनों में भी प्रतीक्षा सूची घटी है।

राठी का कहना है कि इसका एक प्रमुख कारण रेलवे द्वारा दिवाली के समय 29 विशेष ट्रेनें तथा कुछ नई ट्रेनों को चलाना है। रेल यात्री एप को उपयोग करने वालों की संख्या करीब 50 लाख है। अध्ययन में एप उपयोग करने वालों से प्राप्त आंकड़ों तथा अन्य स्रोतों से ली गयी जानकारी का उपयोग किया गया है।

शशिकला और उनके रिश्तेदारों के ठिकानों पर आयकर का छापा

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चेन्नई। आयकर विभाग ने एआइएडीएमके की नेता वीके शशिकला और उनके रिश्तेदारों के ठिकानों पर फिर से छापेमारी की है।

आयकर विभाग छापेमारी से पहले एहतियातन सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे, क्योंकि ऐसी आंशका थी कि छापेमारी के दौरान शशिकला के समर्थक विरोध कर सकते हैं।

आयकर विभाग ने कड़ी सुरक्षा के बीच चेन्‍नई के पोस गार्डन में छापेमारी शुरू की। इससे पहले शुक्रवार को तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता के आवास पोएस गार्डन के एक हिस्से पर छापा मारा। 

आयकर विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि एक दफ्तर और दो कमरों की तलाशी ली गई। इनमें से एक कमरे का इस्तेमाल अन्नाद्रमुक की बर्खास्त महासचिव वीके शशिकला करती थीं।

अधिकारी ने बताया कि हमने पोएस गार्डन के पूरे परिसर की तलाशी नहीं ली है। सिर्फ पूनगुंद्रन के कमरे, रिकार्ड रूम और शशिकला के कमरे पर छापेमारी की गई है। पूनगुंद्रन दिवंगत जयललिता के सहायक थे।

यह छापेमारी कई शहरों में शशिकला और उनके रिश्तेदारों के खिलाफ जारी तलाशी के तहत की गई है। शशिकला के कुछ समर्थक आयकर विभाग की छापेमारी का विरोध करने के लिए पोस गार्डन के नजदीक जुटे थे।

इन्‍होंने नारेबाजी भी की। लेकिन पुलिस ने स्थिति को बेकाबू नहीं होने दिया और विरोध कर रहे कई समर्थकों को हिरासत में ले लिया। बता दें कि पिछले सप्ताह ही आयकर विभाग ने शशिकला के ठिकानों पर छापेमारी की थी।

आईटी अधिकारियों ने देश भर में शशिकला के 187 ठिकानों पर छापेमारी की थी। शशिकला के समर्थकों ने आईटी की इस कार्रवाई को राजनीतिक षडयंत्र करार दिया था।

अब एक अरब आधार को बैंक खातों और मोबाइलों से जोड़ने पर सरकार की नजर

नई दिल्ली। मूडीज के रेटिंग अपग्रेड और उससे पहले वर्ल्ड बैंक की ईज ऑफ डुइंग बिजनस रैकिंग्स लिस्ट में 30 पायदान की उछाल से उत्साहित मोदी सरकार एक अरब-एक अरब-एक अरब- के अनूठा और महत्वाकांक्षी विजन पर कदम बढ़ाने का विचार कर रही है।

दरअसल, मूडीज और वर्ल्ड बैंक ने नोटबंदी, जीएसटी और आधार लिंकिंग जैसे कदमों की तारीफ की है। एक अरब-एक अरब-एक अरब विजन में एक अरब यूनिक आधार नंबरों को एक अरब बैंक खातों और एक अरब मोबाइलों से जोड़ने की योजना है।

आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, सरकार ने यह लक्ष्य नोटबंदी के कारण 6 लाख करोड़ रुपये के बड़े नोटों के चलन से बाहर हो जाने और बैंक खाते खुलवाने एवं डिजिटल पेमेंट्स के बढ़ते चलन के मद्देनजर यह लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

सरकारी महकमों में यह चर्चा जोरों पर है कि ‘1 प्लस 1 प्लस 1 प्लस’ का आंकड़ा जल्द ही पूरा कर लिया जाएगा, हालांकि इसके लिए कोई तारीख तय नहीं की गई है। यह फाइनैंशल और डिजिटल मेनस्ट्रीम को विस्तार देने की दिशा में बड़ा कदम होगा।

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर 2017 के आखिर तक बड़े नोट करीब 12 लाख करोड़ रुपये मूल्य रह गए जो नवंबर 2016 में 15.44 लाख करोड़ रुपये के थे जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी की घोषणा की थी। एक सूत्र ने कहा, ‘अब (नोटों की) संख्या करीब-करीब इतनी ही रह गई है।’

जिस दर से कुछ खास नोटों की संख्या बढ़ रही थी, उससे अब तक उनका मूल्य 18 लाख करोड़ रुपये के पार कर गया होता, लेकिन अब वे घटकर 6 लाख करोड़ रुपये तक रह गए।

एक सूत्र ने बताया, ‘बड़े मूल्य की मुद्रा या अन्य नोटों की कोई कमी नहीं है। यह जो कमी आई है, उससे काले धन के रूप में नोट जमा करने की आशंका खत्म हो गई।’

मोदी सरकार नोटबंदी, जीएसटी और आधार जैसे सियासी विरोधवाले कदमों का सकारात्मक पहलू ढूंढती है और इनसे उपजे परिणामों को वह काफी संतोषजनक मानते हुए आलोचकों और विपक्षी दलों के साथ कड़वी लड़ाई लड़ चुकी है।

मूडीज ने नई रेटिंग जारी करने से एक दिन पहले इससे सरकार को अवगत कराया था। मूडीज की दृष्टि में ये कदम अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने और इसे ज्यादा पारदर्शी बनाने के लिहाज से गंभीर प्रयास थे।

सरकार अनुमान से इतर अवैध घोषित किए गए 99% नोटों के बैंकों में लौट जाने को लेकर हुए हमले का यह जवाब देती रही है कि इसे नोटबंदी की असफलता के रूप में नहीं देखा जा सकता। सूत्रों के मुताबिक, अगर यही एक मकसद होता तो सरकार नोट बदलने के लिए कुछ विंडोज ओपन नहीं करती।

बड़े नोटों की संख्या में बड़ी कमी को लेस कैश इकॉनमी (मुद्रा का कम प्रचलनवाली अर्थव्यवस्था) की तरफ एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है, जैसा कि सरकार ने कहा भी था। साथ ही, प्रॉपर्टी खरीदने में कैश पेमेंट की सीमा तय करने जैसे कदम उठाए जाने से इस प्रक्रिया में तेजी आने की उम्मीद की जा रही है।

 जीएसटी को लागू किए जाने को लेकर हो रही आलोचना के बावजूद टैक्स वसूली की इस नई व्यवस्था को उन अर्थशास्त्रियों से भी व्यापक समर्थन मिला है जिन्होंने नोटबंदी पर संदेह जाहिर किया था।

डिजिटलाइजेशन प्लान के तहत आधार लिंकिंग और भीम-यूपीआई को भी रेटिंग्स एजेंसियों से मान्यता मिली है। सूत्रों का कहना है कि ट्रांजैक्शन कॉस्ट में कमी के भी सकारात्मक परिणाम आ रहे हैं।

यूईआईडी स्कीम्स और कल्याणकारी योजनाओं के तहत सब्सिडी पेमेंट्स के साथ इसकी लिंकिंग के अलावा पैन कार्ड्स और निजी कंपनियों द्वारा अन्य इस्तेमाल की भी आलोचना यह कहकर हुई कि इससे कई लोग सब्सिडी से वंचित रह जा रहे हैं और लोगों की निजता का उल्लंघन हो रहा है।

जेटली के एक गलत बयान से स्टोन उद्योग में हाहाकार, देखिए वीडियो

-दिनेश माहेश्वरी
कोटा। देश -विदेश में अपनी विशेषताओं के लिए ख्याति प्राप्त कोटा स्टोन उद्योग अब बंद होने के कगार पर है। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली के एक गलत बयान के कारण उद्योग जगत में हाहाकार मचा हुआ है।

हाड़ौती कोटा स्टोन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन और लघु उद्योग भारती कोटा के पूर्व अध्यक्ष राजेंद्र जैन का कहना है कि एक जुलाई को जब जीएसटी लागू हुआ था तब इस पर पांच प्रतिशत ही जीएसटी था। जिसकी पुष्टि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने कोटा एयरपोर्ट के उद्घाटन के समय भी की थी।

इसके बाद एसजीएसटी कमिश्नर ने भी अलग से पत्र भेजकर पांच प्रतिशत ही बताया था। कॉउन्सिल की मीटिंग के बाद जब प्रेस कॉन्फ्रेंस में वित्त मंत्री ने यह कहा कि कोटा स्टोन पर टैक्स 28% से घटाकर 18% कर दिया है , तब से उद्योग जगत में हताशा के बदल छाए हुए हैं।

संस्थापक अध्यक्ष राजेश गुप्ता ने बताया कि इस भ्रम को दूर करने के लिए उद्यमी एक्साइज कमिश्नर से लेकर सांसद तक से मिल चुके हैं, परन्तु स्थिति स्पष्ट नहीं हो पा रही है। टाइल्स और मार्बल से प्रतिस्पर्धा में पिछड़े इस उद्योग की अनदेखी की गई तो जल्द ही ताले लग सकते हैं। तो आइये इस वीडियो के माध्यम से जानें क्या है उद्यमियों की पीड़ा।  

कृषि अर्थव्यवस्था को किया जा रहा नजरअंदाज

पिछले 16 साल में 1 करोड़ किसानों ने छोड़ी खेतीबाड़ी, करीब 3 लाख ने की आत्महत्या

कोटा। गौ विज्ञान अनुसंधान केंद्र नागपुर के समन्वयक एवं राष्ट्रीय गौ वंश आयोग के पूर्व सदस्य सुनील मानसिंहका ने कहा कि पिछले 15 -16 वर्षों में कृषि आधारित अर्थ व्यवस्था को नजरअंदाज करने के कारण देशभर में 1 करोड़ किसानों ने खेती से मुंह मोड़ लिया और 3 लाख किसानों ने आत्महत्या की है।

मानसिंहका ने यह बात शुक्रवार को पत्रकारों से कही। वह यहां शनिवार से हाड़ौती गौ सेवा संस्थान के तत्वावधान में टीलेश्वर महादेव मंदिर में शुरू होने वाले दो दिवसीय संगोष्ठी पंचगव्य आयुर्वेद चिकित्सा शिविर भाग लेने पहुंचे हैं।
उन्होंने कहा देश की 60 से 70 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर है।

लेकिन हरित क्रांति के नाम पर रासायनिक खेती को अपनाने से खेती की जमीन बंजर हो गई और किसानों को खेती से पलायन करना पड़ रहा है। गाय को सिर्फ दुधारू पशु माना गया जबकि उसके गोबर और मूत्र से ही उसका महत्व ज्यादा है। अनुसंधान केंद्र आर्गेनिक खेती को प्रोत्साहित कर रहा है।

पंचगव्य चिकित्सा को बढ़ावा देकर कैंसर जैसे असाध्य रोगों को थामने का प्रयास किया जा रहा है। स्वावलंबी खेती को बढ़ावा देने के लिए गौ पालन, बेल आधारित कृषि को बढ़ाने के काम में महाराष्ट्र एवं पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ने प्रयास शुरू कर दिए हैं। राजस्थान में भी मुख्यमंत्री को ऐसा करना चाहिए।

रासायनिक खेती से मौसम में खतरनाक परिवर्तन हो रहे हैं। भूजल गिर रहा है। रासायनिक खेती से जल की खपत ज्यादा होती है। केंद्र विज्ञान आधारित प्रमाण सरकारों और जनता को समझाने का प्रयास कर रहा है। राजस्थान के सवाई माधोपुर, हनुमानगढ़, झालावाड़ एवं भीलवाड़ा में केंद्र शुरू किए गए हैं।

पंचगव्य आधारित 47 औषधियों का केंद्र ने पैटेंट कराया है। विदेशों से भी रोगी हमारे यहां आकर लाभांवित हो रहे हैं। केंद्र की रीना शाह ने गौ मूत्र पर ही पीएचडी की है। 60 – 70 वर्षों में देश में गुलामी की खेती की परम्परा को जन्म दिया।

अब स्वावलंबी खेती को प्रोत्साहन देने की जरूरत है। संस्थान के अध्यक्ष डॉ. राकेश अग्रवाल, गायत्री परिवार के मुख्य ट्रस्टी जीडी पटेल, वैद्य रघुनंदन शर्मा ने भी गौ आधारिक व्यवस्था पर विचार व्यक्त किए।

अब लौट चलें विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आज से
इधर, हाड़ौती गौ सेवा संस्थान की ओर से दो दिवसीय 18 19 नवंबर को अब लौट चलें विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं पंचगव्य आयुर्वेदिक चिकित्सा शिविर टीलेश्वर महादेव मंदिर सभागार में होगी। पहले दिन शनिवार को सुबह 9:30 बजे उद्‌घाटन सत्र में संगोष्ठी की अध्यक्षता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्रीय गौ सेवा प्रमुख नवरंग लाल शर्मा करेंगे।

मुख्य अतिथि एसएसआई एसोसिएशन के संस्थापक अध्यक्ष गोविंदराम मित्तल होंगे। विशिष्ट अतिथि जिला आयुर्वेद अधिकारी वैद्य कृष्ण कुमार शर्मा और मुख्य वक्ता नागपुर के गौ विज्ञान केंद्र के प्रभारी सुनील मानासिंहका होंगे। कोषाध्यक्ष रवि अग्रवाल ने बताया कि कार्यक्रम सात सत्रों में होगा।

अंतिम सत्र में हाड़ौती और पंचगव्य चिकित्सा पर कोटा के वैद्य रघुनंदन शर्मा, कैलाश शर्मा, ताजेश गोयल एवं आठवें सत्र में गौशाला प्रबंधन चुनौती विषय पर डॉ. महेंद्र गर्ग, गायत्री परिवार गौशाला बंधा के प्रबंधक खेमराज यादव, गोदावरीधाम गौशाला के प्रबंधक विनायक भार्गव आदि विचार व्यक्त करेंगे।