स्वर्ण पदक विजेता बॉक्सर अरुंधति ने मोशन के स्टूडेंट्स को दिए सफलता के टिप्स

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कोटा। स्कॉटलैंड के ग्लासगो शहर में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स-2026 में 70 किलोग्राम महिला बॉक्सिंग में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचने वाली कोटा की बेटी और अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाज अरुंधति चौधरी ने कहा कि हौसले बुलंद हों तो इंसान किसी भी मुश्किल को पार कर सकता है। खेल हो या पढ़ाई, बेहतर परिणाम के लिए खुद पर लगातार काम करना जरूरी है। लक्ष्य बड़ा रखें, मेहनत में कमी न छोड़ें और अपने कोच पर भरोसा रखें।

अरुंधति शुक्रवार को मोशन एजुकेशन के द्रोणा-2 कैंपस में स्टूडेंट्स से रू-ब-रू थीं। उन्होंने कहा कि सफलता के लिए सिर्फ मेहनत ही नहीं, बल्कि सही तकनीक और रणनीति भी जरूरी है। कोच से तकनीक सीखें और समय के साथ अपनी रणनीति में बदलाव करते रहें।

उन्होंने स्टूडेंट्स को अपने संघर्ष के बारे में बताते हुए कहा कि एक दौर ऐसा भी आया था, जब उनका समय खराब चल रहा था। वे ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने से चूक गईं और ट्रेनिंग के दौरान गंभीर चोट के कारण करीब एक महीने अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। लगातार प्रयास करती रहीं और अब पिछले कुछ समय में लगातार कई अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं।

इस दौरान मोशन एजुकेशन के फाउंडर और एजुकेटर नितिन विजय तथा स्टूडेंट्स ने अरुंधति से कई सवाल पूछे, जिनका उन्होंने विस्तार से जवाब दिया। कार्यक्रम में मोशन एजुकेशन के चेयरमैन सुरेंद्र विजय, डायरेक्टर सुशीला विजय, डॉ. स्वाति विजय और अरुंधति की मां सुनीता चौधरी भी मौजूद रहीं।

15 साल की उम्र में शुरू की बॉक्सिंग

राजस्थान से राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली महिला मुक्केबाज अरुंधति ने कहा कि जिंदगी में कुछ नया करने के लिए कैलकुलेटेड रिस्क लेना जरूरी है। उन्होंने अपने खेल करियर की शुरुआत बास्केटबॉल से की थी। बाद में सिंगल गेम की ओर रुख किया और वुशु चैंपियनशिप जीती। इसके बाद 15 साल की उम्र में बॉक्सिंग शुरू की।

अरुंधति ने बताया कि जब उन्होंने बॉक्सिंग शुरू की, तब कोटा में कोई पेशेवर बॉक्सिंग कोच भी नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य को लेकर कोई समझौता नहीं किया। ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स के फाइनल मुकाबले का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि 102 डिग्री तेज बुखार होने के बावजूद वे रिंग में उतरीं और एकतरफा मुकाबले में 5-0 से जीत हासिल कर स्वर्ण पदक जीता। उन्होंने स्टूडेंट्स से कहा कि परिस्थितियां कितनी भी मुश्किल क्यों न हों, कभी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। कई बार मुश्किल समय ही इंसान को उसकी असली ताकत का एहसास कराता है।

रिंग में नौ मिनट मेरे लिए सब कुछ होते हैं

अपनी चोटों के बारे में पूछे जाने पर अरुंधति ने कहा कि नौ साल के बॉक्सिंग करियर में शायद ही कोई ऐसा साल रहा हो, जब वे चोटिल न हुई हों। कभी टखने में स्ट्रेस फ्रैक्चर हुआ तो कभी घुटने में एसीएल की चोट लगी। इसके बावजूद उन्होंने चोट को अपने खेल पर हावी नहीं होने दिया।

उन्होंने कहा, “रिंग में उतरने के बाद मेरे लिए सिर्फ वे नौ मिनट मायने रखते हैं। उन नौ मिनट के लिए महीनों मेहनत की होती है। जब मैं रिंग के अंदर होती हूं तो दर्द के बारे में नहीं सोचती। उस समय दिमाग में सिर्फ तिरंगा और जीत होती है। उन्होंने बताया कि मंगोलिया में हुई एशियन चैंपियनशिप की पहली ही फाइट में उन्हें चोट लग गई थी। इसके बावजूद उन्होंने दर्द को दरकिनार कर मुकाबला जारी रखा।

ओलंपिक में गोल्ड जीतना लक्ष्य

अरुंधति ने कहा कि पिछले चार साल उनके लिए बेहद कठिन रहे। सर्जरी, चोट और मानसिक तनाव के बीच खुद को संभालना आसान नहीं था, लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। पिछले सात महीनों में वे लगातार पांच अंतरराष्ट्रीय स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं।

उन्होंने कहा कि वे पूरी तरह तैयार हैं, लेकिन अभी भी कई क्षेत्रों में सुधार की जरूरत है। कैंप में कोच के साथ मिलकर अपनी कमियों पर काम करना होगा। उनका सबसे बड़ा सपना ओलंपिक पदक जीतना है।

अरुंधति ने बताया कि पिछली बार ओलंपिक क्वालीफिकेशन के दौरान मां की बीमारी और पारिवारिक परिस्थितियों के कारण वे अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन नहीं कर पाईं। उन्होंने कहा, “गलती एक बार हो सकती है, लेकिन उसे बार-बार नहीं दोहराना चाहती। इस बार मैं पूरी तरह तैयार हूं।

उन्होंने बताया कि 2027 से ओलंपिक क्वालीफायर शुरू होंगे और उनका लक्ष्य 2028 लॉस एंजेलिस ओलंपिक में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतना है। उन्होंने स्टूडेंट्स से कहा कि सपने बड़े रखें और उन्हें हासिल करने के लिए हर दिन खुद को पहले से बेहतर बनाने की कोशिश करें।