समता, संयम व सम्यक दर्शन से प्रशस्त होता है आत्मकल्याण का मार्ग: विवर्धन सागर

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कोटा। कुन्हाड़ी स्थित ऋद्धि-सिद्धि नगर के चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में रविवार को आयोजित धर्मसभा में मुनि विवर्धन सागर महाराज ने कहा कि आत्मा के भावों के अनुसार ही कर्मों का आस्रव और बंध होता है। इसलिए जीवन में शुभ भावों को स्थान देकर मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद और कषाय से बचने का प्रयास करना चाहिए। समता और आत्मसंयम के माध्यम से ही कर्मों की निर्जरा संभव है।

मुनि श्री ने कहा कि आत्मा के परिणामों से कर्मों का आगमन होना भाव आस्रव कहलाता है। संकल्प-विकल्प और शुभ-अशुभ चिंतन के कारण कर्मों का आस्रव निरंतर होता रहता है। पूजन के दौरान प्रशस्त भावनाएं पुण्य का कारण बनती हैं, वहीं मन में अशुभ विचार आने पर कर्मों का बंध होता है। इसलिए केवल बाहरी धार्मिक क्रियाएं पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि उनमें भावों की शुद्धता और एकाग्रता भी आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि सम्यग्दृष्टि व्यक्ति सांसारिक कार्य करते हुए भी अपने भावों को शुभ बनाए रखता है। अशुभ भाव उत्पन्न होने पर मन को नियंत्रित करना और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ना जरूरी है। मन को जीतने वाले मुनिराज समता भाव से कर्मों की निर्जरा करते हैं। संसार की अवस्था से मुक्त होने के लिए आत्मसंयम, सम्यक दर्शन और व्रतों को जीवन में अपनाना होगा।