कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में ‘विराग वर्धन वर्षायोग-2026’ के अंतर्गत शनिवार को आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए प्रवर्तक मुनि विश्वनायक सागर महाराज ने कहा कि जीवन में मौन साधना और वाणी का संयम अत्यंत महत्वपूर्ण है। मनुष्य को सदैव हितकारी, मित और प्रिय वाणी का प्रयोग करना चाहिए। शब्दों का सदुपयोग व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारने के साथ ही समाज में प्रेम और सद्भाव बढ़ाता है।
उन्होंने कहा कि तीर्थंकर भगवान भी केवलज्ञान प्राप्त होने तक मौन साधना में रहते हैं। सर्वज्ञ ज्ञान प्राप्त होने के बाद ही उनकी दिव्यध्वनि खिरती है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि अधूरे ज्ञान में मौन रहना ही उचित है। ‘अधजल गगरी छलकत जाए’ कहावत के माध्यम से उन्होंने समझाया कि कम ज्ञान वाला व्यक्ति अधिक बोलता है, जबकि ज्ञानी व्यक्ति आवश्यकता होने पर ही बोलता है। बिना पूछे दो व्यक्तियों के बीच बोलने वाले को मूर्ख कहा जाता है।
मुनि श्री ने भगवान श्रीराम के व्यवहार का उदाहरण देते हुए कहा कि उनका आचरण इतना श्रेष्ठ था कि पूरी अयोध्या उनके साथ वन जाने के लिए तैयार थी। उन्होंने गोपालदास बरैया द्वारा रचित ‘सिद्धांत प्रवेशिका’ का उल्लेख करते हुए कहा कि एक शब्द औषधि का कार्य कर सकता है। इसलिए हमारी वाणी हितकारी, मित और प्रिय होनी चाहिए। हितकारी शब्दों के माध्यम से हम पूरे संसार को अपना बना सकते हैं।
इस अवसर पर सकल समाज अध्यक्ष प्रकाश बज, पदम बडला, संरक्षक विमल नांता, विनोद टोरड़ी, कार्याध्यक्ष मनोज जैसवाल, धर्म जैन सीए, ताराचंद बडला, युवा प्रकोष्ठ संयोजक पारस बज आदित्य, इंदर पाटनी, टीकम पाटनी, आर.के. पटौदी, पारस कासलीवाल, पारस लुहाड़िया सहित सकल समाज के सदस्य उपस्थित रहे।

