शास्त्र अध्ययन को आचरण में उतारना ही वास्तविक साधना: मुनि विवर्धनसागर

0
5

कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकाचंद्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर में ‘विराग वर्धन वर्षायोग-2026’ के अंतर्गत गणधर मुनि विवर्धनसागर महाराज ने रविवार को अपने सारगर्भित प्रवचन में मंगलाचरण के आध्यात्मिक एवं व्यावहारिक महत्व का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि ‘मंगल’ वह है, जो जीव के लिए पुण्य का संचय करे, शुभता का संचार करे तथा पापों का क्षय करने का माध्यम बने।

उन्होंने कहा कि तीर्थंकर भगवान की महिमा ऐसी है कि सौ-सौ इंद्रों के समूह भी उनके श्रीचरणों में मस्तक झुकाकर वंदना करते हैं। यह केवल श्रद्धा का प्रतीक नहीं, बल्कि अहंकार के परित्याग और विनम्रता के सर्वोच्च आदर्श का संदेश भी देता है। मंगलाचरण का उद्देश्य नास्तिकता, संशय और अशुभ भावों का परिहार कर श्रद्धा, सद्भाव और सम्यक् दृष्टि का विकास करना है। यह शिष्ट आचरण, सद्व्यवहार और आध्यात्मिक अनुशासन का प्रतीक है, जिससे जीवन के सभी कार्य निर्विघ्न रूप से संपन्न होते हैं।

मुनिश्री ने कहा कि शास्त्र अध्ययन की परंपरा में प्रारंभ, मध्य और अंत तीनों चरणों में मंगलाचरण का विशेष महत्व बताया गया है। शास्त्र के आरंभ में मंगलाचरण करने से शिष्य श्रद्धा और विनम्रता के साथ ज्ञानार्जन के लिए पात्र बनता है। अध्ययन के मध्य मंगलाचरण से विद्या की निर्विघ्न प्राप्ति होती है तथा एकाग्रता और ग्रहणशीलता बनी रहती है। वहीं अध्ययन के अंत में किया गया मंगलाचरण अर्जित ज्ञान के फल, उसके आत्मसात होने और आध्यात्मिक कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।

कार्यक्रम में सकल दिगम्बर जैन समाज के संरक्षक राजमल पाटौदी, अध्यक्ष प्रकाश बज, महामंत्री पदम बड़ला, मंदिर कोषाध्यक्ष ताराचंद बड़ला, बसंत दोषी, निर्मल अजमेरा, प्रकाश पहाड़िया, मनोज निर्खी, सुरेश देईवाले, चंद्रप्रकाश बंसल, विनोद सरसोप, मोनू बाकलीवाल, नितेश खटोड़, सुरेंद्र पहाड़िया, पारस गोधा, अशोक पांडिया तथा चंद्रप्रभु दिगम्बर नवयुवक मंडल के सदस्य सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।