कोटा। Muni Vivardhan sagar Maharaj Pravachan: रिद्धि-सिद्धि नगर कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में मंगलवार को धर्मसभा में मुनि विवर्धनसागर महाराज ने सिद्ध भगवान के स्वरूप की व्याख्या करते हुए कहा कि सिद्ध परमात्मा आठ कर्मों से रहित, निष्कर्म तथा आठ अनंत गुणों से युक्त होते हैं।
जीव कर्मों के कारण संसार में भ्रमण करता है। राग-द्वेष के परिणाम कर्मबंधन का कारण बनते हैं, जबकि इन परिणामों की मंदता धर्ममार्ग की ओर पुरुषार्थ करने की प्रेरणा देती है।
उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन करते हुए कर्मों से मुक्त होकर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना होना चाहिए। सिद्ध भगवान के प्रमुख गुणों में अनंत दर्शन, अनंत ज्ञान, अनंत वीर्य, अनंत सुख, सूक्ष्मत्व, अवगाहनत्व, अगुरुलघुत्व और अव्याबाधत्व शामिल हैं।
मुनि श्री ने सम्यग्दर्शन के तीन भेद औपशमिक, क्षायोपशमिक और क्षायिक का उल्लेख करते हुए कहा कि मोहनीय कर्म के क्षय से क्षायिक सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है। जीवन में कैसी भी परिस्थितियां आएं, धर्म और सम्यक दृष्टि को नहीं छोड़ना चाहिए।
उन्होंने कहा कि ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और अंतराय कर्म घातिया कर्म हैं। इनके पूर्ण नाश होने पर केवलज्ञान की प्राप्ति होती है। केवलज्ञानी समस्त लोक के पदार्थों को प्रत्यक्ष रूप से जानता है।
धर्मसभा में सकल समाज अध्यक्ष प्रकाश बज, जैनेंद्र जैन, महावीर बड़ला, बसंतीलाल दोषी, नरेंद्र सेठिया, सुरेश देईवाले, प्रकाश पहाड़िया, कैलाश जेठानीवाल, कैलाश जैन सहित गुरु सेवा संघ परिवार के सदस्य उपस्थित रहे।

