नई दिल्ली। Agricultural Growth:अल नीनो को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच 2026-27 में एग्रीकल्चर GDP या तो स्थिर रहेगी या थोड़ी कम हो जाएगी। जानकारों का कहना है कि किसानों ने पहले ही ज्यादा पानी और ज्यादा कमाई वाली फसलों की जगह कम पानी की जरूरत वाली, लेकिन कम कमाई देने वाली फसलों (जैसे बाजरा, ज्वार और मूंग) की खेती करने की योजना बना ली है।
इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस के डिस्टिंग्विश्ड प्रोफेसर और एग्रीकल्चरल कॉस्ट्स एंड प्राइसेस कमीशन के पूर्व चेयरमैन अशोक गुलाटी ने इसे लेकर चेतावनी दी है। उन्होंने कहा, ‘बारिश कब और कहां कितनी होती है, इस आधार पर एग्रीकल्चर-GDP ग्रोथ लगभग जीरो या नेगेटिव भी हो सकती है।’
गुलाटी ने कहा, ‘IMD ने मजबूत अल नीनो का अनुमान लगाया है। बारिश के ‘लॉन्ग पीरियड एवरेज’ (LPA) का 90% रहने की संभावना है। इसलिए खेती के लिए यह साल काफी बुरा रहने वाला है। जाहिर है, उन किसानों के लिए भी जिनकी ज्यादातर कमाई खेती से होती है।’
गुलाटी को चिंता है कि 2026 का साल सूखे जैसे हालात वाला हो सकता है। वह बोले, ‘इससे निश्चित रूप से किसानों की कमाई पर बुरा असर पड़ेगा। पूरी अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा।’ ग्रामीण अर्थव्यवस्था खपत का एक अहम ड्राइवर है। यह ज्यादातर कंज्यूमर गुड्स की बिक्री का 30-40% हिस्सा है।
किसानों की आय दोगुनी करने वाली समिति के पूर्व चेयरमैन और वर्तमान में कर्नाटक एग्रीकल्चरल प्राइस कमीशन के चेयरमैन अशोक दलवाई ने कहा कि कोर मॉनसून जोन में अनुमानित 94% बारिश से सोयाबीन, अरहर, उड़द और कपास जैसी फसलों में नमी की भारी कमी (मॉइस्चर स्ट्रेस) हो सकती है। उन्होंने कहा, ‘लंबे समय तक सूखा पड़ने से पैदावार और किसानों की कमाई सीधे तौर पर कम हो सकती है।’
वह बोले, ‘ईंधन की बढ़ती कीमतों से जमीन तैयार करने, मशीनों से खेती करने और डीजल से चलने वाले सिंचाई पंप सेट के ऑपरेशनल खर्च बढ़ रहे हैं।’
खुदरा महंगाई का बढ़ना तय
गुलाटी का मानना है कि कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) आधारित महंगाई का बढ़ना तय है। उन्होंने कहा, ‘दालों, तिलहन, कपास, मोटे अनाज और सब्जियों के उत्पादन पर बुरा असर पड़ने की संभावना है और उनकी कीमतें बढ़ेंगी।’
उन्होंने कहा, ‘मुझे उम्मीद है कि खाने-पीने की चीजों की महंगाई बढ़ेगी। कुल CPI महंगाई भी 5% से ऊपर चली जाएगी, जो अक्टूबर-नवंबर तक लगभग 6% तक पहुंच सकती है।’
- खाद, कीटनाशकों और खेती में इस्तेमाल होने वाली दूसरी चीजों की बढ़ती लागत का भी किसानों की कमाई पर असर पड़ने की आशंका है।
- खाद की कमी के बीच, किसान ग्रे मार्केट से ज्यादा कीमत पर खाद खरीद रहे हैं।
- साथ ही, ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल युद्ध की वजह से सप्लाई में रुकावट आई है।
- इससे ट्रैक्टरों में इस्तेमाल होने वाले डीजल की कीमत भी बढ़ गई है।
- उन्हें जून-सितंबर मॉनसून सीजन के दूसरे हिस्से में नमी की कमी के कारण फसल पर भी बुरा असर पड़ने की आशंका है।
खेती का रकबा घटा रहे किसान
पश्चिमी महाराष्ट्र के भंडगांव के किसान राहुल पवार ने नहर का पानी न मिलने के डर से गन्ने की खेती का रकबा 60% कम करने का फैसला किया है। उन्होंने कम पानी वाली कम समय में तैयार होने वाली फसलों, जैसे बाजरा और सब्जियों की खेती करने का फैसला किया है। पवार खेती के आधुनिक तरीकों और मार्केट रिसर्च से अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए जाने जाते हैं।
उन्होंने इकोनॉमिक टाइम्स से कहा, ‘मैं गन्ने की खेती का रकबा कम कर रहा हूं। कारण है कि मेरे खेत सिंचाई के लिए नहर के पानी पर निर्भर हैं। कम बारिश के कारण जलाशय नहीं भरेंगे। इसलिए मुझे गन्ने के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल पाएगा।’
राजस्थान में किसान धान और सोयाबीन की खेती का रकबा कम करने की योजना बना रहे हैं। किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष, राजस्थान के रामपाल जाट ने कहा, ‘हालांकि, लोग अल-नीनो के बारे में जानते हैं। लेकिन, वे पहले की तरह घबराए हुए नहीं हैं, जब सिंचाई की सुविधा न के बराबर थी।’

