Soybean import scam: भारत में सोयाबीन आयात में हुआ बड़ा घोटाला

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दोषी आयातकों पर लगेगा 45 फीसदी शुल्क, नाइजर में पैदावार से ज्यादा हुआ आयात

नई दिल्ली। इस साल के पहले सात महीनों में नाइजर भारत को सोयाबीन का सबसे बड़ा घोषित आपूर्तिकर्ता था, जबकि वहां तिलहन का कोई महत्वपूर्ण उत्पादन नहीं होता है। भारतीय सीमा शुल्क अधिकारी नाइजर से आने वाले सोयाबीन के आयात में हुई अचानक वृद्धि की जांच कर रहे हैं।

उन्हें संदेह है कि माल नाइजीरिया से आया था और आयात शुल्क से बचने के लिए उस पर गलत लेबल लगाया गया था। अखिल भारतीय खाद्य तेल व्यापारी महासंघ ने सरकार से मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच करने का आग्रह किया है ।

यह जांच ऐसे समय में हो रही है जब पिछले साल की बाढ़ के बाद सूखे से घरेलू उत्पादन प्रभावित होने के कारण भारत आयातित सोयाबीन पर अधिक निर्भर हो गया है। इस स्थिति से टोगो और बेनिन को आधिकारिक चैनलों के माध्यम से भारत को सोयाबीन निर्यात बढ़ाने के अवसर मिल सकते हैं।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2026 के पहले सात महीनों में, भारत ने रिकॉर्ड 909,606 टन सोयाबीन का आयात किया, जो 2025 की इसी अवधि में मात्र 1,996 टन से काफी अधिक है। विशेष रूप से, नाइजर से उत्पन्न होने वाली घोषित सोयाबीन की मात्रा शून्य से बढ़कर 380,868 टन हो गई।

भारत नाइजर सहित सबसे कम विकसित देशों से शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति देता है। अफ्रीकी सोयाबीन प्रसंस्करण उद्योग के आकलन के अनुसार, नाइजर प्रति वर्ष 100 टन से भी कम सोयाबीन का उत्पादन करता है। वहीं, पड़ोसी देश नाइजीरिया अफ्रीका में सोयाबीन का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है। हालांकि वैश्विक स्तर पर इसकी रैंकिंग काफी नीचे है।

भारतीय सीमा शुल्क अधिकारियों ने आयातकों से यह साबित करने को कहा है कि नाइजर से आयातित घोषित सोयाबीन की खेप तरजीही शुल्क छूट की शर्तों को पूरा करती है। यदि माल को नाइजर से आयातित घोषित करने में गलती पाई जाती है, तो आयातकों पर 45% की गैर-तरजीही शुल्क दर लागू होगी।

आयातकों को भेजे गए नोटिस में भारतीय सीमा शुल्क प्राधिकरण ने कहा कि नाइजर में सोयाबीन का उत्पादन बहुत कम है, इसलिए देश से आयात “नाइजर की सामान्य उत्पादन और निर्यात क्षमता से अधिक” है।

आयातकों द्वारा शुल्क-मुक्त व्यवहार के लिए आवश्यक दस्तावेज, जिनमें मूल प्रमाण पत्र और नाइजर द्वारा जारी पादप स्वच्छता प्रमाण पत्र शामिल हैं, उपलब्ध कराने के बाद भारतीय सीमा शुल्क द्वारा इन खेपों को पहले ही मंजूरी दे दी गई थी। नाइजर एक लैंडलॉक देश है, इसलिए नाइजर से सोयाबीन को उसके पड़ोसी देश नाइजीरिया के क्षेत्र से होकर ले जाया जा सकता है।

कुछ भारतीय आयातकों ने कहा है कि उनके पास सीमा शुल्क विभाग द्वारा मांगी गई आवश्यक जानकारी नहीं है। उन्होंने अपने विदेशी आपूर्तिकर्ताओं से अतिरिक्त दस्तावेज उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है।

एक आयातक को सीमा शुल्क विभाग से एक सूचना मिली जिसमें कहा गया था कि आपूर्तिकर्ताओं द्वारा नाइजर से माल की उत्पत्ति की पुष्टि करने और सभी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने के बाद उन्होंने सोयाबीन का आयात किया है। हालांकि, इस आयातक ने तर्क दिया कि वे माल की उत्पत्ति की पुष्टि करने के लिए व्यक्तिगत रूप से अफ्रीका की यात्रा नहीं कर सकते।

न्यूज एजेंसी रायटर्स के मुताबिक दुबई स्थित एक निर्यातक ने बताया कि भारतीय आयातकों को पिछले महीने के अंत में नोटिस मिलने शुरू हो गए थे और तब से उन्होंने नाइजर से उत्पन्न होने वाली घोषित सोयाबीन की खरीद बंद कर दी है। निर्यातकों ने कहा कि बंदरगाहों पर पहुंच चुके और अब पारगमन में मौजूद माल के फंसने की संभावना है, क्योंकि न तो आयातक और न ही निर्यातक 45% शुल्क का भुगतान करना चाहते हैं।

अखिल भारतीय खाद्य तेल व्यापारी महासंघ ने सरकार से मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच करने का आग्रह किया है। संघ के अध्यक्ष शंकर ठक्कर ने कहा कि नाइजर में सोयाबीन के उत्पादन की तुलना में वहां से घोषित आयात की मात्रा काफी अधिक दिखाई दे रही है।

फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर किसी भी आयातक या निर्यातक के बारे में पूर्व निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। संबंधित पक्षों द्वारा प्रस्तुत मूल प्रमाणपत्र, पादप स्वच्छता प्रमाणपत्र, परिवहन दस्तावेज और अन्य रिकॉर्ड की जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी खेप के लिए मूल देश की जानकारी सही नहीं थी और इसके कारण अनुचित रूप से शुल्क-मुक्त सुविधा का लाभ लिया गया, तो नियमानुसार उचित कार्रवाई की जानी चाहिए।

खाद्य तेल महासंघ ने सरकार से आग्रह किया है कि जांच के दौरान यह भी स्पष्ट किया जाए कि संबंधित प्रमाणपत्र किस प्राधिकरण द्वारा जारी किए गए, माल का वास्तविक परिवहन मार्ग क्या था तथा नाइजर से घोषित खेपों की शुल्क-मुक्त पात्रता किन दस्तावेजों के आधार पर निर्धारित की गई।

शंकर ठक्कर ने कहा कि भारत में सोयाबीन की उपलब्धता और कीमतों पर आयात का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। इसलिए इस मामले में तथ्यों की स्पष्टता आवश्यक है, ताकि किसानों, उपभोक्ताओं, वैध व्यापार करने वाले आयातकों और सरकारी राजस्व सभी के हितों की रक्षा की जा सके।