मादक वस्तुओं का व्यसन तन, मन और धन नष्ट करता है: मुनि विवर्धनसागर

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द्रव्यसंग्रह की गाथा के माध्यम से समुद्घात के स्वरूप और आध्यात्मिक महत्व की व्याख्या

कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में धर्मसभा में मुनि विवर्धनसागर ने द्रव्यसंग्रह की गाथा के माध्यम से जैन दर्शन में वर्णित समुद्घात के विभिन्न स्वरूपों की व्याख्या करते हुए आत्मकल्याण और संयम का मार्ग अपनाने का संदेश दिया।

मुनि विवर्धनसागर ने कहा कि विक्रिया समुद्घात में देव आदि जीव अपने स्वाभाविक रूप को छोड़कर अलग-अलग रूप धारण करते हैं। मनुष्य और तिर्यंच भी विशेष परिस्थितियों में अपना रूप बदल सकते हैं।

उन्होंने तेजस समुद्घात के शुभ और अशुभ दोनों स्वरूपों को समझाते हुए कहा कि निर्मल भावना रखने वाले ऋषि-मुनियों में विशेष परिस्थितियों में शुभ तेजस शरीर के माध्यम से जीवों के कल्याण की भावना प्रकट हो सकती है।

वहीं अशुभ तेजस समुद्घात का उदाहरण द्विपायन मुनिराज के प्रसंग से समझाया गया, जिसमें क्रोध आदि अशुभ भावों के परिणामस्वरूप विनाशकारी स्थिति उत्पन्न हुई।

मुनिश्री ने धर्मसभा में व्यसन के दुष्परिणामों पर भी श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि मादक वस्तुओं का व्यसन शुरुआत में व्यक्ति को अच्छा या आकर्षक लग सकता है, लेकिन धीरे-धीरे यही आदत उसके तन, मन और धन को नष्ट कर देती है।

इसलिए व्यक्ति को व्यसन से दूर रहकर संयमित और सात्विक जीवन जीना चाहिए। उन्होंने कहा कि आत्मसंयम ही जीवन को सही दिशा देने का प्रभावी माध्यम है। मंदिर अध्यक्ष राजेंद्र गोधा और पंकज खटोड़ ने बताया कि धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं समाजजन उपस्थित रहे।