नई दिल्ली। भारतीय किसानों द्वारा 2025-26 के रबी सीजन में ईसबगोल की खेती अपेक्षाकृत कम क्षेत्रफल में की गई और मौसम की स्थिति पूरी तरह अनुकूल नहीं होने से इसकी उपज दर में भी कमी आ गई। भारतीय ऑर्गनिक क्षेत्र के लिए नए नियमों- शर्तों के कारण वैश्विक बाजार में ईसबगोल (साईलियम) का निर्यात प्रभावित हो रहा है।
हैरानी की बात है कि उत्पादन में गिरावट आने के बावजूद ईसबगोल का भाव नरम पड़ गया है। हालांकि प्रतिकूल मौसम तथा छोटे बिजाई क्षेत्र के कारण वर्ष 2026 की पहली तिमाही के दौरान ईसबगोल एवं इसकी भूसी के दाम में कुछ तेजी आई थी। भारी बेमौसमी वर्षा एवं आंधी-तूफान के कारण इसके उत्पादन में 20 से 30 प्रतिशत तक की गिरावट आने का अनुमान है लेकिन पिछला बकाया स्टॉक ऊंचा होने के कारण बाजार में इसकी आपूर्ति एवं उपलब्धता की स्थिति काफी हद तक सुगम बनी हुई है।
व्यापार विश्लेषकों के अनुसार मूंदड़ा बंदरगाह पर जून 2025 में ईसबगोल भूसी (99 प्रतिशत) का फ्री ऑन बोर्ड निर्यात ऑफर मूल्य औसतन 8720 डॉलर प्रति टन के आसपास चल रहा था जो दिसम्बर 2025 तक आते-आते घटकर 7750 डॉलर प्रति टन के करीब रह गया। ध्यान देने की बात है कि जून 2024 में ईसबगोल भूसी (99%) का निर्यात ऑफर मूल्य उछलकर 10,200 डॉलर प्रति टन की ऊंचाई पर पहुंच गया था और दिसम्बर 2024 में भी यह 9400 डॉलर प्रति टन के ऊंचे स्तर पर कायम था।
मार्च 2026 में ईसबगोल के घरेलू उत्पादन में 20 प्रतिशत की गिरावट का अनुमान लगाया गया था लेकिन उसके बाद मौसम खराब होने से उत्पादन में 10 प्रतिशत की अतिरिक्त कमी आने की संभावना व्यक्त की जाने लगी। इससे ईसबगोल भूसी का निर्यात ऑफर मूल्य मार्च में बढ़कर 8150 डॉलर प्रति टन पर पहुंचा मगर मांग मजबूत नहीं होने के कारण मई 2026 में यह घटकर 7850 डॉलर प्रति टन पर आ गया।
वर्तमान समय में फ्री ऑन बोर्ड औसत इकाई निर्यात ऑफर मूल्य ईसबगोल भूसी 99 प्रतिशत का 7850 डॉलर प्रति टन, 98 प्रतिशत का 6000 डॉलर तथा 95 प्रतिशत का 5090 डॉलर प्रति टन बताया जा रहा है। इसी तरह ईसबगोल भूसी पाउडर का निर्यात ऑफर मूल्य 99 प्रतिशत क्वालिटी का 6520 डॉलर, 98 प्रतिशत का 5550 डॉलर प्रति टन और 95 प्रतिशत का 4410 डॉलर प्रति टन चल रहा है।
सरकारी एजेंसी- कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) द्वारा ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन के लिए एक नया नियम लागू किया गया है जिससे इसकी डिलीवरी में देर हो सकती है और ऑर्गेनिक ईसबगोल भूसी का अभाव पैदा हो सकता है।
पूर्व प्रचलित नियम के विपरीत अब केवल उत्पादक समूह को ही नहीं बल्कि छोटे-बड़े सभी किसानों को अपना रजिस्ट्रेशन करवाना आवश्यक है। इस रजिस्ट्रेशन की समय सीमा तो बढ़ा दी गई है मगर इस नियम से छोटे-छोटे उत्पादक काफी परेशान हैं और वे सही ढंग से माल की आपूर्ति नहीं कर पा रहे हैं।

विवाह पूर्व सहमति से शारीरिक संबंध बनाना चरित्र पर दाग नहीं: सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत ने हाल ही में कहा है कि अगर दो अविवाहित वयस्क आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाते हैं तो वह उन दोनों में से किसी के भी चरित्र पर काला धब्बा बताने का आधार नहीं हो सकता है।
कोर्ट ने दो टूक कहा कि उनके आपसी रिश्ते किसी व्यक्ति के चरित्र के बारे में गलत राय बनाने का कारण और आधार नहीं हो सकते हैं। जस्टिस मनमोहन और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने यह भी कहा कि हर रिश्ता शादी में नहीं बदलता और सिर्फ़ इसलिए कि कोई रिश्ता शादी में नहीं बदला, यह नतीजा नहीं निकाला जा सकता कि एक पक्ष ने दूसरे को धोखा दिया है।
पीठ ने यह टिप्पणी तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड को एक ऐसे उम्मीदवार की नियुक्ति का निर्देश देते हुए की, जिसका पुलिस कांस्टेबल पद पर चयन एक असफल प्रेम संबंध से जुड़े आपराधिक मामले में संलिप्तता के कारण रद्द कर दिया गया था।
पीठ ने कहा, ”दो अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बने शारीरिक संबंध उस संबंध में शामिल लोगों के चरित्र के बारे में प्रतिकूल धारणा बनाने का आधार नहीं हो सकता और न ही होना चाहिए। ऐसा कोई कानून नहीं है जो दो अविवाहित वयस्कों को सहमति से अपनी पसंद का संबंध रखने से रोकता हो।”
इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि शादी के वादे पर रेप के मामले में लोक अदालत के सामने समझौता करने का मतलब अपराध कबूल करना नहीं है। साथ ही, अगर रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे पता चले कि पीड़िता पर समझौता करने के लिए दबाव डाला गया था, तो नियोक्ता (employer) ऐसे समझौते से कोई गलत नतीजा नहीं निकाल सकता।
शीर्ष अदालत ने मामले में पीड़ित उम्मीदवार द्वारा दायर अपील को स्वीकार कर लिया और तेलंगाना हाई कोर्ट के एकल न्यायाधीश के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें ‘स्टाइपेंडरी कैडेट ट्रेनी पुलिस कांस्टेबल’ के पद पर उसकी नियुक्ति पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया गया था।
तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड ने उनकी नियुक्ति इस आधार पर रद्द कर दी थी कि 2014 में उनके खिलाफ शादी का झांसा देकर बलात्कार करने का जो मामला दर्ज किया गया था, वह नैतिक पतन को दर्शाता है।
क्या है मामला
यह मामला पड़ोसी के साथ संबंध से जुड़ा है और दोनों पक्षों के बीच समझौता होने के बाद 2015 में लोक अदालत में इसका निपटारा हो गया था। आईपीसी की धारा 376 के तहत कोई आरोप नहीं लगाया गया था। मामले का जिक्र करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अपीलकर्ता और पीड़िता पड़ोसी थे और लगभग चार साल तक उनके बीच संबंध थे। पीठ ने कहा, ”हर रिश्ता शादी में तब्दील नहीं होता। इसलिए, सिर्फ इसलिए कि रिश्ता शादी में तब्दील नहीं हुआ, यह मानने का कोई आधार नहीं है कि एक पक्ष ने दूसरे को धोखा दिया है।”
पीठ ने यह भी कहा, ”यदि यह समझौता करने के लिए बल प्रयोग या धमकी का मामला होता, तो प्रतिवादी अनुशासित बल में नियुक्ति के लिए अपीलकर्ता की उपयुक्तता पर निर्णय लेने में न्यायसंगत होता।
हालांकि, यहां ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि पीड़िता पर समझौता थोपा गया था।” शीर्ष अदालत ने कहा कि आपराधिक न्यायशास्त्र में, जब तक किसी अदालत में आरोप सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक निर्दोष होने की धारणा बनी रहती है।