कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में सोमवार को आयोजित धर्मसभा में प्रवर्तक मुनि विश्वनायक सागर महाराज ने कहा कि आत्मा नित्य है, जबकि संसारी अवस्था अनित्य है। मनुष्य को अपने कर्मों का क्षय कर आत्मा के सिद्ध स्वरूप को प्राप्त करने की दिशा में प्रयास करना चाहिए।
मुनिश्री ने कहा कि अनेक ज्ञानी एक ही सत्य पर पहुंचते हैं, जबकि अज्ञानी के अनेक मत हो सकते हैं। जैन दर्शन में आत्मा को नित्य माना गया है। शरीर परिवर्तनशील है, लेकिन शरीर में विद्यमान आत्मा कभी नष्ट नहीं होती। जिन आत्माओं ने अपने कर्मों का पूर्ण क्षय कर लिया, वे सिद्ध अवस्था को प्राप्त हो गईं और संसार के आवागमन से मुक्त हो गईं।
उन्होंने जैन आगमों में वर्णित कालचक्र की विशालता का उल्लेख करते हुए कहा कि उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल मिलकर एक कल्पकाल का निर्माण करते हैं। सागर और कोड़ाकोड़ी सागर जैसे कालखंडों की कल्पना भी मानव जीवन की सीमितता के सामने काल की विशालता को दर्शाती है। सिद्ध आत्माएं इस संसार में पुनः जन्म नहीं लेतीं और अनंत सुख, शांति तथा अव्याबाध गुणों से युक्त रहती हैं।
वर्तमान समय में संस्कारों और जीवनशैली में आ रहे बदलावों पर चिंता व्यक्त करते हुए मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य को अपनी बुद्धि और विवेक को सही दिशा में लगाना चाहिए। धर्म की दृष्टि और अच्छे संस्कार ही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। व्यक्ति जैसा कर्म करता है, उसे उसी के अनुरूप परिणाम प्राप्त होते हैं।

