अहिंसा प्रत्येक जीव के प्रति मैत्री एवं करुणा का भाव रखने की जीवन शैली है

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कोटा। गणधर मुनि विवर्धनसागर महाराज ससंघ की धर्मसभा का आयोजन कुन्हाडी स्थित एक निजी स्कूल में किया गया। प्रवर्तक मुनिश्री विश्वनायक सागर महाराज ने जैन दर्शन में काल की अवधारणा बताते हुए कहा कि अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी काल की मान्यता जैन परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अवसर्पिणी काल के प्रारंभ में कुलकरों की परंपरा रही और अंतिम कुलकर नाभिराय हुए, जिनके पुत्र प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव हुए।

मुनिश्री ने कहा कि दिगंबर जैन मुनियों का जीवन त्याग, संयम और अहिंसा का उदाहरण है। वे पदविहार करते हैं, केशलोच करते हैं तथा जीवों की रक्षा के लिए सावधानीपूर्वक जीवन जीते हैं। अहिंसा केवल किसी को चोट नहीं पहुंचाने का नाम नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव के प्रति मैत्री और करुणा का भाव रखने की जीवन पद्धति है।

उन्होंने कहा कि छोटी-छोटी बातों पर क्रोध मनुष्य के जीवन में अशांति पैदा करता है। भगवान महावीर का अहिंसा और मैत्री का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उन्होंने बताया कि महात्मा गांधी जैन चिंतक श्रीमद् राजचंद्रजी से प्रभावित थे और गांधीजी ने अहिंसात्मक आंदोलन के माध्यम से स्वतंत्रता संघर्ष को नई दिशा दी।

विवर्धन सागर महाराज ने कहा कि भगवान महावीर के ‘जियो और जीने दो’ तथा ‘अहिंसा परमो धर्मः’ के सिद्धांतों को गांधीजी ने अपने जीवन में अपनाया। उन्होंने कहा कि विद्यालय बच्चों को शिक्षा के साथ संस्कार देने का भी महत्वपूर्ण केंद्र हैं। वर्तमान समय में परिवार और समाज से बढ़ती दूरी चिंता का विषय है। माता-पिता, परिवार और समाज से जुड़ाव कमजोर होने पर संस्कारों और धार्मिक मूल्यों से भी दूरी बढ़ सकती है।

मुनिश्री ने मोबाइल के अत्यधिक उपयोग को लेकर भी बच्चों को सचेत किया। उन्होंने कहा कि मोबाइल पर अनावश्यक समय बिताने से आवश्यक कार्यों और जिम्मेदारियों की उपेक्षा होने लगती है। बच्चों को समय का सदुपयोग करते हुए शिक्षा, संस्कार और परिवार के साथ जुड़ाव को प्राथमिकता देनी चाहिए।

मंगलविहार आज
विवर्धन सागर महाराज एवं प्रवर्तक विश्वनायक सागर महाराज ससंघ का 3 अक्टूबर को दोपहर 3:30 बजे रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर से पंचबालायती दिगंबर जैन मंदिर, जवाहरनगर के लिए मंगलविहार होगा। रात्रि विश्राम जवाहरनगर में रहेगा। 4 अक्टूबर को प्रातः 6 बजे मुनिसंघ जवाहरनगर से मंगलविहार कर आर.के.पुरम स्थित त्रिकाल चौबीसी में मंगल प्रवेश करेगा, जहां आहारचर्या भी संपन्न होगी।