बरखा जोशी एवं उनकी शिष्याओं के कथक नृत्य में साकार हुईं कृष्ण की लीलाएं

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कोटा। रविवार को भारतीय कला, संस्कृति, कथक और हवेली संगीत का अद्भुत संगम देखने को मिला। मुखिया मदनलाल जोशी स्मृति संस्थान की ओर से रोड नंबर एक पर स्थित एक ऑडिटोरियम में आयोजित ‘श्री वल्लभम् कथक समारोह’ में कथक गुरु और उनकी शिष्याओं ने भगवान श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं को नृत्य, संगीत और भावाभिनय के माध्यम से जीवंत कर दिया।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि ‘श्री वल्लभम् कथक समारोह’ केवल कला और संस्कृति का आयोजन नहीं, बल्कि इसमें आध्यात्म और धर्म का संदेश भी निहित है। ऐसे आयोजन भारतीय संस्कृति, सत्य और धर्म के मूल्यों को समाज तक पहुंचाने का माध्यम बनते हैं। कला के माध्यम से संस्कारों और नैतिक मूल्यों का प्रसार होता है तथा नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का अवसर मिलता है।

उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव हमें धर्म, कर्म, सत्य और कर्तव्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। श्रीकृष्ण का जीवन हमें विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य, विवेक और कर्तव्यनिष्ठा के साथ आगे बढ़ने का संदेश देता है। भारतीय संस्कृति की यही विशेषता है कि इसमें कला, आध्यात्म और जीवन-मूल्यों का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।

बिरला ने कहा कि कथक भारत की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा है। कथक के माध्यम से हमारी परंपराएं, कथाएं, आध्यात्मिक भाव और सांस्कृतिक विरासत पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती है। ऐसे आयोजनों से संस्कृति और धर्म की भावना मजबूत होती है तथा समाज में नैतिक एवं मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा होती है।

कार्यक्रम का शुभारंभ बरखा जोशी की कृष्ण वंदना से हुआ। कृष्ण श्लोकों के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण के विविध स्वरूपों का भावपूर्ण वर्णन किया गया। इसके बाद ‘पांडुरंग पांडुरंग हरी विठ्ठला’ की प्रस्तुति ने वातावरण को भक्ति रस से सराबोर कर दिया। प्रस्तुति में कथक की शास्त्रीय गरिमा और भक्ति की भावधारा का सुंदर समन्वय देखने को मिला।

इसके बाद बरखा जोशी की नन्हीं शिष्याओं ने सरगम नृत्य प्रस्तुत कर अपनी प्रतिभा की छटा बिखेरी। ताल, लय और भावों के सधे हुए संयोजन ने दर्शकों को प्रभावित किया। तराना की प्रस्तुति में भगवान श्रीकृष्ण की दो प्रमुख लीलाओं—कालिया दमन और मटकी लीला—को कथक की भाषा में साकार किया गया।

नृत्य की गति, भावाभिनय और पद संचालन के माध्यम से कृष्ण की बाल लीलाओं का मनोहारी चित्र उपस्थित हुआ। समारोह का सबसे भावपूर्ण और भव्य क्षण राजाधिराज श्रीनाथजी की आरती के दौरान देखने को मिला।

बरखा जोशी ने श्रीनाथजी की आरती प्रस्तुत की, जिसमें उनकी 70 शिष्याओं ने एक साथ दीप नृत्य किया। हाथों में प्रज्ज्वलित दीप लिए कलाकारों की लयबद्ध प्रस्तुतियों से पूरा मंच श्रीनाथजी के दिव्य दरबार जैसा प्रतीत होने लगा। ऐसा दृश्य था मानो मंच पर कोई भव्य श्रीनाथजी उत्सव साकार हो उठा हो।

प्रस्तुति के चरम पर मीरा की कृष्ण भक्ति और उनके कृष्ण स्वरूप में विलीन होने की भावपूर्ण कथा को नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। इसके बाद ‘द्वारकाधीश की जय’ के जयघोष से पूरा पांडाल गूंज उठा। दर्शकों ने तालियों के साथ कलाकारों का उत्साहवर्धन किया और वातावरण कृष्णमय हो गया। समारोह की संयोजिका बरखा जोशी ने बताया कि कार्यक्रम की अध्यक्षता गोस्वामी विनय कुमार महाराज ने की।

विशिष्ट अतिथि रेडक्रॉस सोसायटी के अध्यक्ष राजेश कृष्ण बिरला ने कहा कि भारतीय कला और संस्कृति हमारी अमूल्य धरोहर है। ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ने के साथ ही प्रतिभावान कलाकारों को अपनी कला के प्रदर्शन का मंच प्रदान करते हैं। इस अवसर पर कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले कलाकारों का सम्मान किया गया।