ज्ञान का सदुपयोग दान और धर्म की प्रभावना में करें: मुनि विवर्धनसागर

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कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर में ‘विराग वर्धन वर्षायोग-2026’ के अंतर्गत धर्मसभा को संबोधित करते हुए सोमवार को गणधर मुनि विवर्धनसागर महाराज ने ज्ञान के महत्व और उसके सदुपयोग पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जैन दर्शन में ज्ञान के आठ भेद बताए गए हैं।

क्षयोपशमिक ज्ञान और क्षायिक ज्ञान के स्वरूप को समझाते हुए उन्होंने कहा कि मतिज्ञान और श्रुतज्ञान सभी जीवों में पाए जाते हैं, लेकिन प्रत्येक जीव में ज्ञान की क्षमता और उसकी अभिव्यक्ति अलग-अलग होती है। किसी व्यक्ति को कोई बात एक बार पढ़ने या सुनने से याद हो जाती है, जबकि किसी अन्य को उसी बात को कई बार दोहराने के बाद भी स्मरण करने में कठिनाई होती है। यह अंतर कर्मों के क्षयोपशम के कारण होता है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन के साथ प्राप्त ज्ञान का वास्तविक सदुपयोग तभी है, जब उसका उपयोग दान, धर्म और जिनवाणी की प्रभावना में किया जाए। दान करते समय संकोच नहीं करना चाहिए तथा खुले मन से धर्म और सेवा के कार्यों में सहयोग करना चाहिए। दान की भावना जितनी निर्मल और उदार होगी, उसका आध्यात्मिक फल भी उतना ही व्यापक होगा।

कार्यक्रम में सकल दिगम्बर जैन समाज के संरक्षक राजमल पाटौदी, विमल जैन नांता, अध्यक्ष प्रकाश बज, कार्यध्यक्ष जे.के. जैन, महामंत्री पदम बड़ला, मंदिर अध्यक्ष राजेन्द्र गोधा, मंत्री पंकज खटोड़, ताराचंद बड़ला, टीकम पाटनी, महेंद्र सामरिया, सुरेश देईवाले, पारस कासलीवाल, पारस लुहाड़िया, नरेंद्र सेठिया सहित गुरु सेवा संघ परिवार व चंद्रप्रभु दिगम्बर नवयुवक मंडल के सदस्य उपस्थित रहे।