गौमूत्र पर टिप्पणी कर प्रियंका गांधी फंसी, जानिए क्या कहा शिक्षाविदों ने

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नई दिल्ली। एंटी पेपर लीक बिल पर लोकसभा में मंगलवार (28 जुलाई) को कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी द्वारा IIT मद्रास के डायरेक्टर प्रो. वी. कामकोटि के बारे में टिप्पणी किए जाने का विवाद गहरा गया है।

अब देशभर के कुलपतियों, पूर्व कुलपतियों समेत करीब 215 शिक्षाविदों ने प्रियंका गांधी वाड्रा को एक खुला खत लिखा है और लोकसभा में की गई उनकी टिप्पणी की आलोचना की है।

शिक्षाविदों का तर्क है कि लोकतंत्र में असहमति का स्वागत है, लेकिन व्यक्तिगत मजाक वैज्ञानिक सोच और जानकारीपूर्ण सार्वजनिक चर्चा को कमजोर करता है। इस विवाद ने राजनीतिक भाषा, शैक्षणिक स्वतंत्रता और विद्वानों के सम्मान पर बहस को फिर से हवा दे दी है।

दरअसल, प्रियंका गांधी ने कहा था कि प्रधानमंत्री मोदी जी ने एक ऐसी कमेटी बनाई है, जिसमें गौमूत्र विषेषज्ञ हैं। उन्होंने उन्होंने IIT मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामकोटि को “गौमूत्र विशेषज्ञ” कहा था।

उसी के विरोध में शिक्षाविदों ने खुली चिट्ठी लिखी है। इस चिट्ठी में कहा गया है कि इस तरह की टिप्पणी, चाहे वह कटाक्ष हो या राजनीतिक बयानबाजी, एक व्यक्ति से कहीं अधिक व्यापक चिंताएँ पैदा करती है और लोकतंत्र में तर्कसंगत संवाद की जगह उपहास को बढ़ावा देती है।

वैज्ञानिक उपलब्धियों का अपमान
इस चिट्ठी पर दस्तखत करने वाले शिक्षाविदों ने प्रोफेसर कामकोटि के वैज्ञानिक योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि वह देश के शीर्ष तकनीकी विशेषज्ञों में से एक हैं। उनके पास IIT मद्रास से कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग में एम.एस. और पीएच.डी. की डिग्रियां हैं, और उन्होंने 150 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित किए हैं। इतना ही नहीं, वह भारत के पहले उद्योग-स्तर के माइक्रोप्रोसेसर के पीछे मार्गदर्शक शक्ति रहे हैं और उन्हें DRDO जैसे संस्थानों से अकादमिक उत्कृष्टता पुरस्कार भी मिल चुके हैं। विद्वानों का कहना है कि ऐसे प्रतिष्ठित विद्वान को केवल एक ‘लेबल’ के माध्यम से खारिज करना उनके योगदान को कमतर आंकने जैसा है।

वैज्ञानिक सोच को कमजोर करता है
चिट्ठी में कहा गया है कि किसी विद्वान के विचारों के सार पर चर्चा करने के बजाय उन्हें किसी लेबल से खारिज करने से उस वैज्ञानिक सोच को कमज़ोर करने का जोखिम होता है जिसे विकसित करने के लिए हमारा संविधान हर नागरिक से कहता है। हमारे वैज्ञानिकों, विद्वानों और शिक्षकों को यह जानने का हक है कि वे बिना इस डर के सार्वजनिक बहस में भाग ले सकते हैं कि उन्हें खारिज करने वाले लेबल दिए जाएंगे। जब जटिल वैज्ञानिक सवाल राजनीतिक मज़ाक का विषय बन जाते हैं, तो समाज जानकारीपूर्ण बहस का अवसर खो देता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर खतरा
खुले पत्र में तर्क दिया गया है कि किसी विद्वान के विचारों के साथ जुड़ने के बजाय उन्हें एक लेबल देकर खारिज करना उस ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ को कमजोर करता है, जिसे विकसित करना हमारे संविधान के अनुसार प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। पत्र के अनुसार, वैज्ञानिक दृष्टिकोण केवल अपरंपरागत विचारों के प्रति संदेह रखना नहीं है, बल्कि दावों को स्वीकार या अस्वीकार करने से पहले उनका निष्पक्ष परीक्षण करना भी है। इतिहास गवाह है कि कई विचार जिन्हें कभी असंभव माना जाता था, बाद में वैज्ञानिक रूप से मान्य सिद्ध हुए।

अकादमिक समुदाय को गलत संदेश
शिक्षाविदों ने चिंता जताई है कि इस तरह की राजनीतिक टिप्पणियां भारत के अनुसंधान और शैक्षणिक समुदाय के बीच एक नकारात्मक संदेश भेजती हैं। पत्र में कहा गया है कि हमारे वैज्ञानिकों और शिक्षकों को यह विश्वास होना चाहिए कि वे बिना किसी ‘अपमानजनक लेबल’ के डर के सार्वजनिक चर्चाओं में भाग ले सकते हैं। विद्वानों का कहना है कि आप उनके तर्कों की आलोचना करें या साक्ष्यों को चुनौती दें, लेकिन उनकी विद्वता का अपमान न करें।

गुणवत्ता पर असर
चिट्ठी में कहा गया है कि जन-प्रतिनिधियों द्वारा की जाने वाली राष्ट्रीय चर्चा का गुणवत्ता पर बहुत असर होता है। जब जटिल वैज्ञानिक सवाल राजनीतिक मज़ाक का विषय बन जाते हैं, तो समाज जानकारीपूर्ण बहस का मौका खो देता है। पत्र में उम्मीद जताई गई है कि भविष्य की बहसें, खासकर संसद के भीतर, इन मूल्यों को दिखाएंगी क्योंकि हमारा लोकतंत्र इससे कम का हकदार नहीं है। इस चिट्ठी पर दस्तखत करने वालों में आईसीटी मुंबई के पूर्व कुलपति प्रो. जी.डी. यादव और भारतीय विश्वविद्यालय संघ की महासचिव प्रो. पंकज मित्तल शामिल हैं।