कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में मंगलवार को आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए गणधर मुनि विवर्धनसागर महाराज ने कहा कि भगवान की वाणी को समझकर यदि मनुष्य उसके अनुरूप जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करे तो वह आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।
उन्होंने द्रव्य के उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य स्वरूप की व्याख्या करते हुए कहा कि संसार में प्रत्येक वस्तु में प्रतिपल परिवर्तन होता रहता है। उत्पाद नवीन पर्याय के प्रकट होने को, व्यय पूर्व पर्याय के समाप्त होने को तथा ध्रौव्य वस्तु के स्थायी स्वरूप को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि परिवर्तन संसार की स्वाभाविक प्रक्रिया है और इसे समझना जैन दर्शन के मूल सिद्धांतों को समझने के लिए आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य की पर्याय का व्यय होता है, जबकि दूसरी पर्याय का उत्पाद होता रहता है। जैन दर्शन में किसी एक व्यक्ति का अलग-अलग संबंधों में पिता, पुत्र, पति या अन्य रूप में होना अनेक दृष्टियों से वस्तु को देखने की प्रक्रिया को दर्शाता है। इसे स्याद्वाद की अवधारणा से समझा जा सकता है।
मुनिश्री ने कहा कि प्रत्येक जीव में परमात्मा बनने की शक्ति वर्तमान, भूत और भविष्य तीनों कालों में विद्यमान रहती है। भगवान महावीर भी पूर्व में सिद्धार्थ राजा के पुत्र और राजकुमार थे। बाद में उन्होंने वैराग्य धारण कर साधना का मार्ग अपनाया और अंततः सिद्ध अवस्था को प्राप्त हुए। उन्होंने कहा कि आत्मा की शुद्ध अवस्था की प्राप्ति के लिए मनुष्य को भगवान की वाणी के अनुरूप अपने जीवन और परिणामों को निर्मल बनाने का प्रयास करना चाहिए।
इस अवसर पर सकल समाज अध्यक्ष प्रकाश बजाज, जैनेंद्र जज, महावीर वैद्य, पुष्प लुहाड़िया, महेंद्र गोधा, वर्धमान खटोड़, पारस कासलीवाल, आशीष साकुनिया, संदीप बंसल, महेंद्र ठाई, राजू पाटनी सहित समाजबंधु उपस्थित रहे।

