संयम, सत्य और सदाचार से प्रशस्त होता है आत्मकल्याण का मार्ग: मुनि विवर्धनसागर

0
7

कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में विवर्धनसागर महाराज ससंघ के सान्निध्य में बुधवार को धर्मसभा हुई। मुनिश्री ने कहा कि नए कर्मों के आगमन को रोकना संवर और संचित कर्मों का क्षय करना निर्जरा है। दोनों ही मोक्षमार्ग के प्रमुख आधार हैं।

मुनिश्री ने नाव का उदाहरण देते हुए समझाया कि छेद बंद करना संवर और नाव में भरे पानी को बाहर निकालना निर्जरा के समान है। इसी प्रकार जीव को नए कर्मों का बंध रोकने के साथ संचित कर्मों से मुक्ति का प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि हिंसक भाव, असत्य और कटु वचन पाप कर्मों के बंध का कारण बनते हैं। हंसी-मजाक में भी असत्य बोलने और शास्त्रों के वचनों का गलत अर्थ करने से बचना चाहिए। मनुष्य को हितकारी, संयमित और सत्य वचन बोलने चाहिए।

अहंकार और अपमानजनक भाषा विवाद को बढ़ाते हैं, इसलिए पाप से दूर रहकर सदाचरण अपनाना आवश्यक है। मंदिर अध्यक्ष राजेन्द्र गोधा व मंत्री पंकज खटोड ने बताया कि प्रारंभ में श्रुति मुनि विश्वदक्षसागर ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया।