श्रीमद भागवत कथा: सुदामा चरित्र और भक्ति की महिमा में डूबे श्रद्धालु

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कोटा। श्री धरणीधर जन सेवा संस्थान एवं समस्त धाकड़ समाज, कोटा के संयुक्त तत्वावधान में विनोबाभावे नगर स्थित खड़े गणेश जी रोड पर श्री धरणीधर गार्डन में आयोजित भव्य ‘श्रीमद भागवत कथा एवं रासलीला महोत्सव’ के छठे दिन शुक्रवार को श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा।

कथा के षष्ठम् दिवस पर बनेठ वाले गुरुदेव ने व्यासपीठ से ज्ञान की गंगा बहाते हुए कहा कि प्रत्येक भक्त के संग में सदा भगवान चलते हैं, बस शर्त इतनी है कि भक्त की भावना सच्ची होनी चाहिए। जहाँ भक्त की विशेष श्रद्धा होती है, वहाँ फिर भक्त नहीं बल्कि साक्षात भगवान ही निवास करते हैं।

बनेठ वाले गुरुदेव ने सुदामा जी के प्रसंग का अत्यंत मार्मिक उदाहरण करते हुए श्रद्धा को परिभाषित किया। उन्होंने कहा कि सुदामा जी के घर में पत्नी और बच्चे भूखे थे, भोजन का एक दाना नहीं था, इसके बावजूद वे सदैव प्रसन्न रहकर मन से हरि भजन में लीन रहते थे।

सुदामा जी का मानना था कि ‘परस्थिति’ का अर्थ पराई स्थिति है, वह हमारी वास्तविक स्थिति नहीं हो सकती। गुरुदेव ने कहा कि जो सुख आने पर भगवान को भूल जाए और जो अत्यधिक दुख आने पर भी भगवान को बिसरा दे, वे सच्चे भक्त नहीं हैं।

यदि जीवन में सुख या दुख बढ़े, तो उसके साथ भजन की मात्रा भी बढ़ानी चाहिए। जब भजन बढ़ेगा तो भगवान अंग-संग हो जाएंगे। फिर जहाँ हम जाएंगे वहाँ हम परछाई बनकर और भगवान हमारी छाया बनकर साथ चलेंगे।

उन्होंने जीवन दर्शन समझाते हुए कहा कि जिस रथ में भगवान बैठे, उसकी महाभारत में जीत हो गई; ठीक इसी तरह जिस हृदय में भगवान बैठेंगे, उसकी भवसागर में जीत सुनिश्चित है। मरना और डूबना तो तय है, अब निर्णय मनुष्य को करना है कि वह भवसागर में डूबना चाहता है या गिरधर नागर की भक्ति में।

​कलयुग के प्रभाव पर चिंता व्यक्त करते हुए गुरुदेव ने कहा कि आज कलयुग ने मनुष्य की मति का हरण कर लिया है। जिस ढोलक, मंजीरे और हारमोनियम पर भजन बजते हैं। उसी पर गाना बजने पर लोग भजन छोड़ गानों पर नाचने लगते हैं, यही मति हरण है।

भगवान ने मनुष्य को सबसे ऊँचा बनाया, पर आज उसकी अकल ओछी हो गई है। उन्होंने समाज को संदेश दिया कि सुंदरता होने पर भी संस्कृति को अपनाया जा सकता है। सभी लोग अपना काम-धंधा और नौकरी करें, लेकिन अपने संस्कार, संस्कृति, सनातन और सांवरिया को कभी न भूलें।

रुक्मिणी हरण के प्रसंग पर बोलते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि रुक्मिणी जी भागी नहीं थीं, बल्कि वे भगवान की भक्ति में जागी थीं। इस दौरान उन्होंने “हे नाथ, हे मेरे नाथ! चढ़ाए तो तेरे मंदिर की पेड़ी चढ़ाना और गिराए तो तेरे चरणों में गिराना” और “श्याम सलोने तेरी शरणं में आया…” जैसे भजनों से पाण्डाल को भक्तिमय कर दिया।

​दिव्य रासलीला में कलाकारों ने किया मंत्रमुग्ध
​कथा के साथ ही महोत्सव में रासलीला का भी भव्य आयोजन हुआ। वृंदावन के ख्यातिप्राप्त कलाकार हरिवल्लभ शर्मा ‘छोटे ठाकुर’ महाराज के कुशल निर्देशन में कलाकारों द्वारा अद्भुत और मनोहारी मंचन किया गया। छठे दिन के प्रसंगों में कलाकारों ने भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, गोपियों संग महारास, उद्धव-गोपी संवाद और विशेष रूप से रुक्मिणी विवाह के प्रसंगों का अत्यंत जीवंत और भावपूर्ण मंचन कर उपस्थित भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया। ​