कोटा। श्री धरणीधर जन सेवा संस्थान एवं समस्त धाकड़ समाज, कोटा के संयुक्त तत्वावधान में विनोबाभावे नगर स्थित खड़े गणेश जी रोड पर स्थित श्री धरणीधर गार्डन में भव्य ‘श्रीमद भागवत कथा महोत्सव’ का आयोजन किया जा रहा है।
कथा के आठवें दिन रविवार को बनेठ वाले गुरुदेव परम पूज्य हरिओम महाराज ने अपनी सुमधुर वाणी से श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। कथा के दौरान महाराज श्री ने जीवन प्रबंधन और अध्यात्म से जुड़े कई महत्वपूर्ण सूत्र भक्तों के सामने रखे।
बनेठ वाले गुरुदेव ने कथा प्रसंगों का वर्णन करते हुए कहा कि प्रत्येक मनुष्य को भगवान के सानिध्य में ही अपना जीवन जीना चाहिए। परमात्मा ही इस संसार में सबकी आत्मा के वास्तविक आधार हैं और उनके बिना जीवात्मा अधूरी है।
जो मनुष्य इस नश्वर संसार को छोड़कर भगवान का भजन किए बिना चला जाता है, परलोक में उसका कोई आदर नहीं होता और उसे यमदूतों की प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। जो मनुष्य अपने नौ द्वारों (इंद्रियों) पर नियंत्रण पाकर परमात्मा के धाम जाता है, उसी का वहां आदर और लाड होता है।
इस पूरी सृष्टि में ईश्वर के अलावा हमारा अपना कोई दूसरा नहीं है। विडंबना यह है कि जो हमारा नहीं है (संसार), उसे हम छोड़ नहीं पा रहे और जो वास्तव में हमारा है (भगवान), उससे हम जुड़ नहीं पा रहे हैं। त्रिगुणमयी माया ने मनुष्य को ऐसा उलझाया है कि वह ईश्वर की ओर कदम ही नहीं बढ़ा पाता।
संस्कारवान जीवन ही असली सुंदरता
गुरुदेव ने समाज पर कटाक्ष करते हुए कहा कि जो मनुष्य सुबह बिना मंजन के भोजन करता है वह ढोर (पशु) के समान है, और जो व्यक्ति जीवन में भगवान का भजन नहीं करता वह चोर के समान है। जीवन का असली लक्ष्य यह भौतिक संसार नहीं, बल्कि सांवरिया (श्रीकृष्ण) को पाना है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे मोबाइल कवर के साथ सुरक्षित और अच्छा लगता है, ठीक वैसे ही मानव जीवन भी सुंदर संस्कारों से ही श्रेष्ठ बनता है। असली सुंदरता सजने-संवरने में नहीं, बल्कि भगवान की भक्ति में है। माता-पिता को सीख देते हुए उन्होंने कहा कि केवल औलाद पैदा करना ही माता-पिता का कर्तव्य नहीं है, बल्कि अपनी संतान में उच्च संस्कार भरना ही उनका असली दायित्व है।
व्यसन और धन के नशे पर प्रहार
कथा के दौरान महाराज श्री ने धन और मदिरा के नशे की तुलना करते हुए कहा कि दोनों का नशा एक जैसा ही घातक है। मदिरा के नशे में धुत व्यक्ति को सड़क पर कुत्ता चाटता है, जबकि धन के अहंकार में डूबा व्यक्ति खुद कुत्ते की गुलामी करने को तैयार हो जाता है। उन्होंने भक्तों को जीवन का मूल मंत्र देते हुए कहा कि जीवन में चाहे सब कुछ खो जाए, लेकिन कभी रोना नहीं चाहिए, और सब कुछ पा लेने के बाद भी भगवान को कभी भूलना नहीं चाहिए।

