श्रद्धा और सम्यक ज्ञान धर्म की सच्ची नींव: आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी

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कोटा। गणिनी आर्यिका रत्न स्वस्तिभूषण माताजी (ससंघ) ने बालिता दिगम्बर जैन मंदिर, कुन्हाड़ी में आयोजित धर्मसभा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि धर्म जीवन की मूल आधारशिला है। जिस प्रकार किसी वृक्ष की जड़ जितनी मजबूत होती है, वह वृक्ष उतना ही विशाल, ऊंचा एवं फलदायी बनता है, उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में श्रद्धा जितनी दृढ़ होगी, धर्म उतना ही अधिक फलित और प्रभावी होगा।

उन्होंने कहा कि केवल श्रद्धा पर्याप्त नहीं है, बल्कि श्रद्धा के साथ सम्यक ज्ञान का होना भी आवश्यक है। आत्मा और परमात्मा के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान ही श्रद्धा को स्थिरता और मजबूती प्रदान करता है। बिना ज्ञान के श्रद्धा अधूरी रहती है और बिना श्रद्धा के ज्ञान निष्प्रभावी हो जाता है।

आर्यिका श्री ने श्रद्धा के महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा कि यदि श्रद्धा हो तो पाषाण की प्रतिमा में भी भगवान के दर्शन होते हैं, जबकि श्रद्धा के अभाव में वही प्रतिमा केवल पत्थर प्रतीत होती है। श्रद्धा से प्रेरित होकर की गई भगवान की पूजा-अर्चना अनंत पापों के क्षय का कारण बनती है तथा आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि मुद्रा के एक साधारण कागज पर जब भारतीय रिजर्व बैंक की मान्यता और मुहर होती है, तभी उसका मूल्य निर्धारित होता है। उसी प्रकार प्रतिमा में जब भगवान की प्रतिष्ठा होती है तो श्रद्धालु उसमें परमात्मा का स्वरूप अनुभव करते हैं। श्रद्धा ही धर्म की जड़ है और विश्वास उसका आधार है।

आर्यिका श्री ने कहा कि जिस प्रकार मनुष्य नाई, चिकित्सक अथवा विभिन्न संस्थाओं पर विश्वास करता है, उसी प्रकार धर्म पर किया गया विश्वास जीवनभर मार्गदर्शन देता है। धर्म केवल जीवन के साथ ही नहीं चलता, बल्कि जीवन के बाद भी आत्मा के कल्याण का आधार बनता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को श्रद्धा, ज्ञान और आचरण के समन्वय से धर्ममय जीवन अपनाना चाहिए।

इस अवसर पर सकल समाज के परम संरक्षक विमल जैन नांता, अध्यक्ष प्रकाश बज, महामंत्री पदम बड़ला, जेके जैन, नरेश वैध, मंदिर अध्यक्ष राजेंद्र गोधा, मंत्री पंकज खटोड़, पारस कासलीवाल, स्वतंत्र पाटनी, बसंतीलाल दोषी, नितेश खटोड़, उत्तम बास्टा, मंदिर अध्यक्ष राजेन्द्र गोधा, मंत्री पंकज खटोड़, कोषाध्यक्ष ताराचंद बड़ला सहित कई लोग उपस्थित रहे।