कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में गुरुवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए प्रवर्तक मुनि विश्वनायक सागर महाराज ने कहा कि जैन दर्शन में जीव और अजीव द्रव्यों का विशद वर्णन किया गया है। जीव चेतन है, जबकि पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल अजीव द्रव्य हैं। इनमें पुद्गल मूर्तिक है, जबकि अन्य अजीव द्रव्य अमूर्तिक माने गए हैं।
उन्होंने आचार्य सिद्धांतदेव नेमीचंद लावले के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि जीव का प्रमुख लक्षण चेतना है। पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक जीवों में भी चेतना विद्यमान होती है। प्रत्येक जीव अपने कर्मों के फल का अनुभव करता है। कर्म का नियम ऐसा है कि जीव को अपने किए हुए कर्मों के अनुकूल फल भोगना ही पड़ता है।
मुनिश्री ने कहा कि एकेंद्रिय से लेकर पंचेंद्रिय तक सभी जीव कर्म के बंधन में रहते हैं। मनुष्य बुद्धिपूर्वक इष्ट और अनिष्ट का विचार करता है तथा अनिष्ट से बचने का प्रयास भी करता है, लेकिन कर्मों के उदय के समय उनके फल से बच पाना संभव नहीं होता। इसलिए व्यक्ति को अपने परिणामों और कर्मों के प्रति सजग रहना चाहिए तथा शुभ भावों के साथ जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए।

