कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में ‘विराग वर्धन वर्षायोग-2026’ के अंतर्गत शुक्रवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए प्रवर्तक मुनि विश्वनायक सागर महाराज ने कहा कि मनुष्य को अपने भीतर विद्यमान चेतना को पहचानने का प्रयास करना चाहिए। जो चेतना से युक्त है, वही जीव तत्व है। आत्मा का स्वरूप चेतन है, जबकि संसार की अन्य वस्तुएं अजीव तत्व के अंतर्गत आती हैं।
मुनिश्री ने कहा कि जैन दर्शन में जीव और अजीव को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है। संसार में दिखाई देने वाले पदार्थों और उनकी विभिन्न अवस्थाओं को समझने के लिए द्रव्य और पर्याय का ज्ञान आवश्यक है। आचार्य भगवान ने द्रव्य के छह भेद बताए हैं, जिनमें जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल शामिल हैं। इनमें जीव चेतन द्रव्य है, जबकि शेष अजीव द्रव्य हैं।
उन्होंने कहा कि जीव अपनी पर्यायों के माध्यम से संसार में विभिन्न अवस्थाओं को प्राप्त करता है। सांसारी जीव अपनी विकारी परिणतियों के कारण जन्म-मरण के चक्र में भटकता रहता है। जब जीव अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानकर सम्यक् परिणामों की ओर बढ़ता है, तभी आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।
उन्होंने भाषा के स्वरूप पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य अलग-अलग क्षेत्रों और परिस्थितियों में हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, संस्कृत आदि अनेक भाषाओं का प्रयोग करता है। भाषा के माध्यम से विचारों और भावों का आदान-प्रदान होता है।
अक्षरों के माध्यम से व्यक्त होने वाली भाषा के साथ अनक्षर रूप में होने वाला संप्रेषण भी प्रकृति और जीव-जगत में दिखाई देता है। पक्षियों तथा अन्य जीवों के संकेत और ध्वनियां भी उनके संप्रेषण का माध्यम हैं।

