कोटा। पुष्टिमार्गीय वैष्णव संप्रदाय की प्रथम पीठ, पाटनपोल स्थित श्री बड़े मथुराधीश मंदिर में व्यास पूर्णिमा का पावन पर्व बुधवार को बड़े ही हर्षोल्लास और पारंपरिक श्रद्धाभाव के साथ मनाया गया। प्रथम पीठ के युवराज गोस्वामी मिलन बावा के सांनिध्य व निर्देशन में मंदिर परिसर में विभिन्न धार्मिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ।
उत्सव के अवसर पर मंदिर में पुष्टिमार्गीय परंपराओं का पूर्ण निष्ठा से निर्वहन किया गया। पर्व की शुभता और पवित्रता के प्रतीक स्वरूप मंदिर के मुख्य द्वारों की देहरी को शुद्ध हल्दी से लीपा गया।
इसके साथ ही प्रवेश द्वारों पर आशापाल के पत्तों और सूत की डोरी से निर्मित सुंदर वंदनवार सजाई गई। प्रभु श्री मथुराधीश जी के दर्शनों के लिए तड़के से ही वैष्णव जन और श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा।
गोस्वामी मिलन बावा ने बताया कि पुष्टिमार्गीय सेवा प्रणाली में गुरु पूर्णिमा का अपना एक विशेष महत्व है। इस दिन प्रभु को मूंग दाल के स्थान पर विशेष रूप से उड़द दाल की पीठी से बनी कचौरी का भोग धराया गया। संप्रदाय में इस परंपरा के कारण ही इस तिथि को ‘कचौरी पूनम’ भी कहा जाता है। प्रभु को यह विशेष ‘पूनम कचौरी’ आरोगाई गई।
उत्सव के दौरान संपूर्ण मंदिर परिसर प्रभु की जय-जयकार और “श्री कृष्णः शरणं मम” के जाप से गुंजायमान रहा। दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं ने दर्शन कर पुण्य लाभ अर्जित किया।
पुष्टिमार्ग में गुरु पूजन का विशेष विधान
इस अवसर पर युवराज गोस्वामी मिलन बावा ने बताया कि पुष्टिमार्गीय वल्लभ संप्रदाय की अपनी अनूठी परंपराएं हैं। यद्यपि गुरु पूर्णिमा पर प्रभु सेवा का विशेष उत्सव मनाया जाता है, लेकिन इस संप्रदाय में गुरुदेव का मुख्य पूजन श्रावण शुक्ल द्वादशी (पवित्रा एकादशी के अगले दिन) को करने का विधान है। उसी दिन गुरु चरणों की विशेष सेवा और पवित्रा (रेशमी सूत के धागे) समर्पित किए जाते हैं।

