स्टॉकिस्ट चना की घबराहट पूर्ण लिवाली अथवा भारी स्टॉक करने से बचें

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नई दिल्ली। कॉन फेडरेशन ऑफ इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के वरिष्ठ उपाध्यक्ष एवं पल्सेस एंड बीन्स ग्रेन एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष प्रदीप जिंदल के अथक प्रयास तथा प्रवीण खंडेलवाल सहित उपभोक्ता मामले विभाग के सचिव एवं अन्य सम्बद्ध लोगों के सहयोग से देसी चना, बंगाल ग्राम एवं चिक पी के बारे में गलतफहमी का बादल छंटने के बाद चना कारोबारियों एवं आयातकों ने राहत की सांस ली है।

दरअसल देसी चना, चिकपी तथा बंगाल ग्राम एक ही है और काबुली चना इससे अलग होता है। लेकिन सरकार ने इसकी एक तीसरी श्रेणी बना दी जबकि उसका कोई अस्तित्व नहीं होता है। बाद में सरकार की गलतफहमी को दूर किया गया।

सरकार ने कस्टम्स के 1607 से 1738 तक के सभी कंसलटेटिव लेटर को वापस लेकर सभी संशय को समाप्त कर दिया। पुराने नोटिस पर 70 प्रतिशत तक का आयात शुल्क लगाने का प्रावधान था जबकि चना पर महज 10 प्रतिशत का शुल्क लागू है।

एक अग्रणी व्यापार विश्लेषक का कहना है कि बेशक इस वर्ष अल नीनो के प्रभाव से मानसून की वर्षा प्रभावित होने की आशंका है जिससे मौजूदा खरीफ सीजन के साथ-साथ आगामी रबी सीजन में भी दलहनों की बिजाई एवं पैदावार पर असर पड़ सकता है लेकिन फिलहाल घबराने या चिंतित होने की जरूरत नहीं है।

सरकारी एजेंसियों- नैफेड एनसीसीएफ के पास दलहनों का रिकॉर्ड स्टॉक मौजूद है। पिछले साल 3.00-3.50 लाख टन चना की सरकारी खरीद हुई थी जो इस बार 700 प्रतिशत बढ़कर 21 लाख टन पर पहुंच गई। उधर ऑस्ट्रेलिया में उत्पादन जरूर घटने की संभावना है लेकिन वहां जो भी उत्पादन होगा उसका अधिकांश भाग भारत में मंगाया जा सकता है।

इसके अलावा तंजानिया-इथोपिया जैसे अफ्रीकी देशों से भी चना का आयात जारी रहेगा। घरेलू उत्पादन भी बेहतर हुआ है। विशाल सरकारी खरीद के कारण चना के दाम में कुछ सुधार आया है लेकिन फिर भी यह एमएसपी से कुछ पीछे है। ऐसी हालत में व्यापारियों / स्टॉकिस्टों एवं मिलर्स को चना की घबराहटपूर्ण लिवाली करने अथवा भारी-भरकम स्टॉक करने से अभी बचना चाहिए।