नई दिल्ली। Judgement: पति की मौत के बाद अगर कोई विधवा महिला दूसरी शादी कर लेती है, तो क्या उसकी बेटी का अपने पिता की संपत्ति पर भी हक खत्म हो जाता है? इस सवाल पर मद्रास हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुराने हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत मां की दूसरी शादी से उसके अपने विरासत अधिकार प्रभावित हो सकते थे, लेकिन इसका असर बेटी के स्वतंत्र उत्तराधिकार अधिकार पर नहीं पड़ता। बेटी अपने दिवंगत पिता की संपत्ति में Class I legal heir के तौर पर अपना हक मांग सकती है।
यह मामला ललितमणि (Lalithamani) से जुड़ा है। उनके पिता वेंकटेशन (Venkatesan) का संयुक्त परिवार की संपत्ति में हिस्सा था। वेंकटेशन की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी ने दूसरी शादी कर ली।
इसके बाद वेंकटेशन के परिवार की ओर से दावा किया गया कि उनकी पत्नी के दूसरी शादी करने के कारण वेंकटेशन का संयुक्त पारिवारिक संपत्ति में मौजूद अविभाजित हिस्सा (Undivided Share) अब उनकी बेटी को नहीं मिलना चाहिए। परिवार का तर्क था कि यह हिस्सा संयुक्त परिवार के बाकी सह-हिस्सेदारों यानी Coparceners के पास वापस चला जाना चाहिए।
कोर्ट का फैसला
कोर्ट ने परिवार की इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने माना कि ललितमणि अपने पिता की बेटी हैं और Class I Legal Heir हैं। इसलिए उन्हें अपने पिता के संयुक्त पारिवारिक संपत्ति में मौजूद Coparcenary Interest को विरासत में पाने का अधिकार है।
कोर्ट ने साफ किया कि मां की दूसरी शादी का असर अगर पुराने कानून के तहत उसके अपने उत्तराधिकार अधिकार पर पड़ता भी है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि बेटी का स्वतंत्र उत्तराधिकार अधिकार भी खत्म हो जाएगा।इस मामले में फैसला मद्रास हाईकोर्ट के जस्टिस पी.बी. बालाजी ने 25 अगस्त 2026 को सुनाया।
दूसरी शादी क्यों महत्वपूर्ण
इस मामले में विवाद इसलिए उठा क्योंकि उत्तराधिकार का फैसला हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की पुरानी धारा 24 के आधार पर किया जाना था। उस समय धारा 24 में कुछ विशेष विधवाओं के लिए प्रावधान था कि अगर उत्तराधिकार खुलने के समय उन्होंने दोबारा शादी कर ली है, तो वे संपत्ति में उत्तराधिकारी बनने से अयोग्य हो सकती हैं। इस मामले में वेंकटेशन की पत्नी ने उनकी मृत्यु के बाद दूसरी शादी कर ली थी। इसलिए पुरानी धारा 24 के तहत वह अपने पति की संपत्ति में हिस्सा पाने का दावा नहीं कर सकती थीं।
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अयोग्यता केवल मां के अधिकार पर लागू होती थी। इससे वेंकटेशन का संपत्ति में हिस्सा खत्म नहीं होता था और न ही वह हिस्सा अपने आप संयुक्त परिवार के दूसरे सदस्यों को मिल जाता था।
एएनबी लीगल की पार्टनर और प्राइवेट क्लाइंट प्रैक्टिस की प्रमुख जाह्नवी कोहली के मुताबिक, कोर्ट ने धारा 24 और धारा 25 के बीच अंतर को भी स्पष्ट किया। धारा 25 में कुछ परिस्थितियों में किसी व्यक्ति को उत्तराधिकार से पूरी तरह अयोग्य माना जा सकता है।
वहीं, धारा 24 के तहत वेंकटेशन का संयुक्त पारिवारिक संपत्ति में हिस्सा खत्म नहीं हुआ। वह हिस्सा उनके दूसरे योग्य क्लास-1 उत्तराधिकारियों, जिसमें उनके बच्चे भी शामिल हैं, के लिए उपलब्ध रहा।
एएनबी लीगल की आदिशा शेट्टी ने कहा कि इस फैसले से साफ होता है कि विधवा की दूसरी शादी होने मात्र से मृतक का संपत्ति में हिस्सा संयुक्त परिवार के दूसरे सदस्यों के पास वापस नहीं चला जाता। ऐसे मामले में बेटी अपने पिता की संपत्ति में उत्तराधिकारी के रूप में अपना अधिकार प्राप्त कर सकती है और कानून के अनुसार उस संपत्ति का इस्तेमाल या प्रबंधन कर सकती है।
बेटी का अधिकार मां के अधिकार से अलग
इस मामले की सबसे अहम बात यह है कि किसी एक कानूनी वारिस पर लागू होने वाली अयोग्यता का असर दूसरे वारिस के अधिकार पर अपने आप नहीं पड़ता। वेंकटेशन की पत्नी ने दूसरी शादी के बाद अपने पति की संपत्ति में हिस्सा नहीं मांगा। वहीं, उनकी बेटी ललितमणि ने अपने पिता की संपत्ति में उनके हिस्से पर बेटी होने के नाते अपना दावा किया।
दिल्ली हाईकोर्ट की अधिवक्ता अपूर्वा पांडे के अनुसार, इस फैसले से स्पष्ट होता है कि विधवा के दोबारा विवाह करने से मृतक का संयुक्त पारिवारिक संपत्ति में हिस्सा खत्म नहीं होता। इस मामले में बेटी ही एकमात्र प्रथम श्रेणी की कानूनी वारिस थी, इसलिए वह अपने पिता के पूरे हिस्से को विरासत में पाने की हकदार थी।
पीएसएल एडवोकेट्स एंड सॉलिसिटर्स के सहयोगी सैयद मूसा ने कहा कि प्रथम श्रेणी के वारिस को मृतक की संपत्ति में स्वतंत्र उत्तराधिकार अधिकार मिलता है। विधवा की दूसरी शादी से उसके अपने अधिकार पर असर पड़ सकता है, लेकिन इसके आधार पर बेटी का कानूनी हिस्सा नहीं छीना जा सकता।
लेगम सोलिस के संस्थापक शशांक अग्रवाल के मुताबिक, यह फैसला इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि माता या पिता की वैवाहिक स्थिति बदलने मात्र से बच्चे का विरासत का अधिकार खत्म नहीं किया जा सकता। विधवा के अधिकार और मृतक की संतान के अधिकार को अलग-अलग आधार पर देखा जाना चाहिए।

